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ग़ज़ल - कभी ठोकरों से सँभल गये -( गिरिराज भंडारी )

कभी ठोकरों से सँभल गये

*********************

11212      11212     11212    11212

न मैं कह सका, न वो सुन सके, मिले लम्हें थे,वो निकल गये

मैं इधर मुड़ा, वो उधर मुड़े , मेरे रास्ते, ही बदल गये

 

तेरी यादों की, हुई बारिशों , ने बहा लिया, कभी नींद को

कभी याद हम ही न कर सके, तो उदासियों में भी ढल गये

 

कभी हालतों से सुलह भी की, कभी वक़्त का किया सामना

कभी रुक गये, कभी जम गये, कभी बर्फ बन के पिघल गये

 

कभी बिन पिये रही बेखुदी, कहीं लड़खड़ाये पिये बिना

कभी पी के भी रहे होश में, कभी ठोकरों से सँभल गये

 

कहीं छोड़ दी सभी कोशिशें, तो हवा की रौ ने बहा लिया

दिया हौसलों ने भी साथ जब, मेरे ख़्वाब सारे मचल गये

 

कभी ये पकड़ ,कभी वो पकड़, कभी जा इधर, कभी जा उधर

कभी तय हुये नहीं रास्ते , वो जो हाथ आये थे पल गये

 

कभी हादिसों ने रुलाया तो , कभी गमज़दों की पुकार ने

कभी बढ़ के दिल से लगा लिया, कभी आँसुओं से दहल गये

******************************************************* 

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

Views: 1043

Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 9, 2015 at 7:25am

आदाणीय सोमेश भाई , आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिये आपका दिल से आभारी हूँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 9, 2015 at 7:24am

आदरणीय खुर्शीद भाई , आपका मेरी गज़ल आना ही मेरा उत्साह वढा देता है , आपके स्नेह के लिये बहुत शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 9, 2015 at 7:21am

आदरणीय विजय शंकर भाई , हौसला अफज़ाई का बहुत शुक्रिया ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 8, 2015 at 10:10pm

//मैं इधर मुड़ा, वो उधर मुड़े , मेरे अब रास्ते, ही बदल गये//

यहाँ मैं भाई मिथिलेश जी से सहमत हूँ .

ग़ज़ल अच्छी लगी आदरणीय गिरिराज भाई साहब, अंतिम शेर का मिसरा उला देख लें, तकाबुले रदीफ़ दीख रहा है. इस ग़ज़ल पर बधाई आदरणीय.

Comment by Anurag Prateek on January 8, 2015 at 9:51pm

आ. मिथिलेश वामनकर सर, कभी मौका मिला तो बोलकर सुनाऊंगा कि इस बहार की  चाल क्या होती है 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 8, 2015 at 9:47pm
आदरणीय अनुराग भाई आप स्पष्ट टिप्पणी कीजिये ताकि बात समझ आ सके। मैंने वो जो हममे तुममे करार था तुम्हे याद हो कि न याद हो गुनगुनाई पर आपकी बात समझ नहीं आई। मार्गदर्शन करे निवेदन है। सादर। एक और निवेदन किताबों के नाम लिखते है साथ में प्रकाशक का नाम भी बता दे तो हम भी कुछ पढ़कर चर्चा लायक बन सकेंगे। अब तक अरूज़ की किताब देखि भी नहीँ है। सादर।
Comment by Anurag Prateek on January 8, 2015 at 9:30pm

 

आ. गिरिराज भंडारीग़ज़ल अच्छी हुई हगे लेकिन इस बह्र के चाल की(मुआफी  चाहता हूँ) जो आत्मा है उस तक कई जगहों पर ठीक से  शायद आप पंहुच नहीं पाए. आप से बहुत सीखने की आशाएं हैं. ‘हकीम  मोमिन’ की ‘’वो जो हममें तुममें ..’’ ग़ज़ल को कुछ देर गुनगुनाएं , बात सामने आ जायेगी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 8, 2015 at 8:12pm

आदरणीय गिरिराज सर इस बह्र में आप कमाल लिखते है आनंद आ गया पढ़कर ... ढेर सारी बधाइयाँ....

मतले में 

मैं इधर मुड़ा, वो उधर मुड़े , मेरे रास्ते, ही बदल गये..... मैं और वो दोनों मुड़े तो फिर मेरे ही रास्ते क्यों बदल रहे है ... रास्ते दोनों के बदले है ... दूसरा मेरे रास्ते... र-रा की टक्कर परेशां कर रही है .... दुई रास्ते, ही बदल वाला कुछ बदलाव हो जाए तो आनंद चौगुना हो जाएगा ... बाकी सभी अशआर बेहतरीन और उम्दा है .... मेरे फेवरेट 

कभी हालतों से सुलह भी की, कभी वक़्त का किया सामना

कभी रुक गये, कभी जम गये, कभी बर्फ बन के पिघल गये

कभी हादिसों ने रुलाया तो , कभी गमज़दों की पुकार ने

कभी बढ़ के दिल से लगा लिया, कभी आँसुओं से दहल गये

Comment by Hari Prakash Dubey on January 8, 2015 at 8:06pm

न मैं कह सका, न वो सुन सके, मिले लम्हें थे,वो निकल गये

मैं इधर मुड़ा, वो उधर मुड़े , मेरे रास्ते, ही बदल गये......बहुत ही सुन्दर रचना  ,  हार्दिक बधाई आदरणीय गिरिराज भंडारी सर ! सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 8, 2015 at 7:54pm

क्या बात है ! बहुत ही उम्दा  गजल i बधाई होi

कृपया ध्यान दे...

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