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मौत ने काटी फसल और जिंदगी बोती रही

रात में फुटपाथ पर इक बेबसी रोती रही,
लोग तो जागे मगर संवेदना सोती रही,

शाम होते ही जमीं पर तीरगी छाने लगी,
आसमानों में सुबह तक रोशनी होती रही,

याद की चादर वो अपने आंसुओं की धार से,
दर्द की कालिख मिटाने के लिए धोती रही,

किसलिए इतनी मशक्कत, जब उसे पीना नहीं
शहद मधुमक्खी न जाने किसलिए ढोती रही

ऐ खुदा तेरी खुदाई का सबब ये भी मिला,
मौत ने काटी फसल और जिंदगी बोती रही।।

.

(अतुल)
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on January 26, 2015 at 11:22am

आदरणीय अतुल जी सुन्दर रचना......

किसलिए इतनी मशक्कत, जब उसे पीना नहीं

शहद मधुमक्खी न जाने किसलिए ढोती रही......हार्दिक बधाई आपको !


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Comment by शिज्जु "शकूर" on January 26, 2015 at 7:33am

//शाम होते ही जमीं पर तीरगी छाने लगी,
आसमानों में सुबह तक रोशनी होती रही,// वाह बहुत बढ़िया अतुल जी

Comment by MAHIMA SHREE on January 25, 2015 at 11:26pm

वाह....बहुत बढ़िया...

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