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Atul kushwah's Blog (24)

जिसे दिल ने चाहा, मिला ही नहीं...

जिसे दिल ने चाहा, मिला ही नहीं
सिवा इसके कोई गिला ही नहीं

नसीबों में उनके बहारें लिखीं
इधर तो कोई सिलसिला ही नहीं

कहां से महकतीं ये फुलवारियां
कोई फूल अब तक खिला ही नहीं

जड़ें उसकी मजबूत थीं इसलिए
शज़र आंधियों में हिला ही नहीं

यहां भीड़ में भी अकेले हैं सब
मुहब्बत का वो काफ़िला ही नहीं।।  # अतुल कन्नौजवी

                                    (मौलिक व अप्रकाशित)

Added by atul kushwah on June 1, 2021 at 8:31pm — 1 Comment

मेरे किरदार को ऐसी कहानी कौन देता है...

जो पहले मौत दे, फिर जिंदगानी कौन देता है

मेरे किरदार को ऐसी कहानी कौन देता है

यहां तालाब नदियां जब कई बरसों से सूखे हैं

खुदा जाने हमें पीने को पानी कौन देता है

हमारी जिंदगी ठहरी हुई इक झील है लेकिन

ये उम्मीदों के दरिया को रवानी कौन देता है

जमीं से आसमां तक का सफर हम कर चुके लेकिन

नहीं मालूम मंजिल की निशानी कौन देता है

परिंदे भी समझते हैं कि पर कटने का खतरा है

इन्हें फिर हौसला ये आसमानी कौन देता…

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Added by atul kushwah on April 20, 2021 at 5:30pm — 6 Comments

बस यही सोच के फेंका था जाल आंखों में...

पूछते क्या हो यूं लेकर सवाल आंखों में

पढ सको पढ लो मेरा सारा हाल आंखों में

देखना था कि समंदर से क्या निकलता है

बस यही सोच के फेंका था जाल आंखों में

वो मिरे सामने आती है झुकाए पलकें

हया को रखा है उसने संभाल आंखों में

नजर से नब्ज पकडकर इलाज कर भी कर दे

वो लेकर चलती है क्या अस्पताल आंखों में

जो उसका साथ है तो तीरगी से डर कैसा

इश्क में जलने लगती है मशाल आंखों में।। #अतुल

                   …

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Added by atul kushwah on April 27, 2020 at 4:50pm — 1 Comment

संकट इस वसुंधरा पर है...

विश्व आपदा में ईश्वर से प्रार्थना

हे मनुष्यता के पृतिपालक हे प्रति पालक हे मनुष्यता

क्या भूल हुई क्या गलती है अब क्षमा करो हे परमपिता।

अब राह दिखाओ दुनिया को मुश्किल सबकी आसान करो

हे कायनात के संचालक सारे जग का कल्याण करो।

ये कैसी विपदा है भगवन कैसा ये शोर धरा पर है

जो सदियों से जीवित है अब संकट उस परम्परा पर है।

जग त्राहि माम कर बैठा है नेतृत्व विफल है प्राणनाथ

शाखों के परिंदों को अपने इन्द्रियातीत मत कर…

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Added by atul kushwah on April 6, 2020 at 10:30pm — No Comments

मुल्क भी हैरान है ऐसा मदारी देखकर...

एक करतब दूसरे करतब से भारी देखकर

मुल्क भी हैरान है ऐसा मदारी देखकर,

 

जिनके चेहरे साफ दिखते हैं मगर दामन नहीं

शक उन्हें भी है तेरी ईमानदारी देखकर,

 

उम्रभर जो भी कमाया मिल गया सब खाक में

चढ गया फांसी के फंदे पर उधारी देखकर,

 

मुल्क में हालात कैसे हैं पता चल जाएगा

देखकर कश्मीर या कन्याकुमारी देखकर,

 

सर्द मौसम है यहां तो धूप भी बिकने लगी

हो रही हैरत तेरी दूकानदारी देखकर,

 

इस…

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Added by atul kushwah on November 16, 2016 at 5:00pm — 16 Comments

गजल: दिल में ठहरा कोई ख्वाब सा रह गया..

दिल में ठहरा कोई ख्वाब सा रह गया

मैं उसे उम्रभर चाहता रह गया,

उसके जैसा कोई भी दिखा ही नहीं

जिसकी तसवीर मैं देखता रह गया,

शाम होते ही वो याद आने लगा

फिर उसे रातभर सोचता रह गया,

मुझसे मिलने वो आया बहुत दूर से

मैं शहर में उसे ढूंढता रह गया,

उसके बारे में अब याद कुछ भी नहीं

हां मगर याद उसका पता रह गया,

थी वो तकदीर शायद किसी और की

मैं दुआ में जिसे मांगता रह गया।।

.

# अतुल…

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Added by atul kushwah on September 2, 2016 at 6:00pm — 3 Comments

वो सर पर हाथ रखकर सौ बलाएं टाल देती है..

- गजल के चार मिसरे - 
घर से जब भी निकलूं मां हमेशा मेरे थैले में
मैं जो कुछ भूल जाता हूं वो चीजें डाल देती है,
न जाने कौन सी जादूगरी है मां के हाथों में
वो सर पर हाथ रखकर सौ बलाएं टाल देती है।।

-----------

 - मुक्तक - 

सुहानी शाम हो जब खूबसूरत, याद रहती है

हर—इक इंसान को अपनी जरूरत याद रहती है
मोहब्बत में कसम—वादे—वफा हम भूल सकते हैं,
मगर ताउम्र हमको एक सूरत याद रहती है।।

.
 मौलिक व अप्रकाशित (अतुल कुशवाह)

Added by atul kushwah on January 4, 2016 at 5:30pm — 2 Comments

वो मुझे देखकर मुस्कराती रही..

मैं उसे देखकर मुस्कराता रहा,

वो मुझे देखकर मुस्कराती रही।

उस कहानी का किरदार मैं ही तो था,

जो कहानी वो सबको सुनाती रही।।

मैं चला घर से मुझ पर गिरीं बिजलियां

बदलियां नफरतों की बरसने लगीं,

बुझ न जाए दिया इसलिए डर गया

देखकर आंधियां मुझको हंसने लगीं,

दुश्मनी जब अंधेरे निभाने लगे

रोशनी साथ मेरा निभाती रही,

मैं उसे देखकर मुस्कराता...

प्यास तुमको है तुम तो हो प्यासी नदी

एक सागर को क्या प्यास होगी भला,

हां अगर तुम…

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Added by atul kushwah on February 12, 2015 at 10:00pm — 14 Comments

मौत ने काटी फसल और जिंदगी बोती रही

रात में फुटपाथ पर इक बेबसी रोती रही,

लोग तो जागे मगर संवेदना सोती रही,

शाम होते ही जमीं पर तीरगी छाने लगी,

आसमानों में सुबह तक रोशनी होती रही,

याद की चादर वो अपने आंसुओं की धार से,

दर्द की कालिख मिटाने के लिए धोती रही,

किसलिए इतनी मशक्कत, जब उसे पीना नहीं

शहद मधुमक्खी न जाने किसलिए ढोती रही

ऐ खुदा तेरी खुदाई का सबब ये भी मिला,

मौत ने काटी फसल और जिंदगी बोती रही।।

.

(अतुल)

मौलिक व…

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Added by atul kushwah on January 25, 2015 at 7:30pm — 23 Comments

मुझको फुर्सत में सताती है मेरी तनहाई...

बात करता हूं तो बातों में मेरी तनहाई

आंसुओं की तरह आंखों में मेरी तनहाई,

मेरी दहलीज पे जलते हुए चरागों को

आंधी बन करके बुझाती है मेरी तनहाई,

बेवफाई का गिला जब भी किया है मैंने

मुस्कराती है, रुलाती है मेरी तनहाई,

मेरे हिस्से के ये इतवार इन्हें तुम ले लो

मुझे फुर्सत में सताती है मेरी तनहाई,

जिंदगी मौत की राहों पे चला करती है

आईना रोज दिखाती है मेरी तनहाई,

दुश्मनों ने तो हमें वार करके छोड…

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Added by atul kushwah on October 27, 2014 at 6:00pm — 11 Comments

लगता है ये त्योहारों का मौसम है..

खुशूबू हैं संगीत हवाएं सरगम हैं

ये आंसू की बूंद नहीं ये शबनम है.

सूरज जब भी ड्यूटी करके घर लौटा
अंधकार में डूबा सारा आलम है,

बडे—बडे तैराक डूबते देखे हैं,
बचकर रहना उसकी आंखें झेलम हैं,

तुम क्या जानो अश्क कहां से आते हैं
उनसे पूछो जिनकी आंखों में गम है,

चौराहों पर पुलिस, लोग सहमे—सहमे
लगता है ये त्योहारों का मौसम है।।


- मौलिक व अप्रकाशित

@ अतुल कुशवाह

Added by atul kushwah on October 7, 2014 at 11:30pm — 5 Comments

तुम्हारी याद में बरसात का मौसम हुईं आंखें..

लगे हैं जोडने में फिर भी अक्सर टूट जाते हैं,

यहां रिश्ते निभाने में पसीने छूट जाते हैं,

भले रंगीन हैं इनमें हवाएं कैद हों लेकिन

ये गुब्बारे जरा सी देर में ही फूट जाते हैं।।

आपका हाथ थामकर मैं चल ही जाऊंगा,

अगर मना करोगे तो मचल ही जाऊंगा,

मैंने माना कि रेस कातिलों से होनी है,

मुझे यकीन है बचकर निकल ही जाऊंगा।।

आजकल ये मन मेरा जाने कहां खोने लगा

जब कभी भी गम लिखा तो ये हृदय रोने लगा,

हाथ में थामी कलम तो खुद—ब—खुद चलने…

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Added by atul kushwah on October 6, 2014 at 5:30pm — 1 Comment

नहीं मालूम उसे बीमारी क्या है...

मेरे बदन में ये खुमारी क्या है
लो हम आ गए हैं तैयारी क्या है,

अच्छा खासा कारोबार मिट गया
दुकानदार से पूछो उधारी क्या है,

हम आपसे भी सलीके से निभा लेते
ये बताओ अपनी रिश्तेदारी क्या है,

तुम भी यार किससे सवाल करते हो
बेईमानों से पूछा है ईमानदारी क्या है,

वो रोज दवा लेने अस्पताल जाता है
नहीं मालूम उसे बीमारी क्या है।।
— मौलिक व अप्रकाशित
— अतुल

Added by atul kushwah on July 16, 2014 at 10:34pm — 8 Comments

उदास मां को एक बेटा हंसा के निकला है..

उदास मां को एक बेटा हंसा के निकला है

अंधेरे घर में वो दीपक जला के निकला है,

पानी गर्म था इसलिए ये खयाल आया,

इस समंदर से तो सूरज नहा के निकला है,

.

जमीं पर दिन के उजाले में उसको देखा था

रात में देखा तो चांद आसमां से निकला है,

वहां पर आज तक सोना कभी नहीं निकला

जहां खोदा गया पानी वहां से निकला है,

उनको देखा तो कायनात मुझसे पूछ उठी

अतुल इतना हसीं 'मौसम' कहां से निकला है।।

- मौलिक व…

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Added by atul kushwah on July 7, 2014 at 6:30pm — 5 Comments

इस समंदर से कोई सूरज नहा के निकला है..

तुझे देखे अगर कोई जलन होती है सीने में,

सितम के सौ बरस गुजरें मोहब्बत के महीने में,

खुदाया क्या हुआ मुझको ये कैसा बावलापन है,

मैं खुद को जब भी देखूं तू दिखाई दे आईने में।।

----------------------------------

बेमतलब की बात बताने लगते हैं

खुद अपनी औक़ात बताने लगते हैं

नेता हैं वे राजनीति के मंचों से

सीने की भी नाप बताने लगते हैं।।

------------------------------------

अंधेरे घर में वो दीपक जला के निकला है

जिस्म की रूह से पसीना बहा के…

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Added by atul kushwah on July 3, 2014 at 10:00pm — 3 Comments

सूरज भी आ गया था आशिकी के दांव में..

कल घूमने गया था समंदर के गांव में,
हिचकोलियां खाती रही कश्ती बहाव में।
 
निकले उधर से जब वो समंदर ठहर गया,…
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Added by atul kushwah on June 17, 2014 at 10:00pm — 16 Comments

मोहब्बत के कलैंडर में कभी इतवार ना आए..

मुक्तक

फकत मेरे ​सिवा तुमको किसी पर प्यार ना आए,

मेरे गीतों में तेरे बिन कोई अशआर ना आए,

मिलन होता रहे तब तक कि जब तक चांद तारे हैं

मोहब्बत के कलैंडर में कभी इतवार ना आए।।

-------------------------------------------

तुम्हारे साथ…

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Added by atul kushwah on February 27, 2014 at 11:00pm — 22 Comments

है करम उसको ये, शायर बना दिया मुझको..

वो मुझे याद है, उसने भुला दिया मुझको

आज की रात फिर उसने रुला दिया मुझको,

ये बताओ कि आजकल हो किसके साथ सनम

किसी को ना मिले, जैसा सिला दिया मुझको।

रुह तो मर गई लेकिन, शरीर जिंदा है

जहर वो कौन सा तुमने पिला दिया मुझको।

हमने उस शख्स को बरसों से नहीं देखा था

उसी की याद ने उससे मिला दिया मुझको।

वो तो कहती थी, उसके दिल का शहंशाह है अतुल

है करम उसको ये, शायर बना दिया मुझको।।

                               …

Continue

Added by atul kushwah on February 18, 2014 at 10:30pm — 3 Comments

जमीं पर आसमां उतर आया...

मेरे जब वो करीब आती है
सांस रुककर हमें सताती है
बात दिल की जो कहना चाहूं तो
बात कुछ और निकल जाती है।।

ये जो चिट्ठी किसी की आई है
अब वो अपनी नहीं पराई है
खाक मिलता है मुझे जिंदगी से
जिंदगी जून है जुलाई है।।

उनका चेहरा जब नजर आया
मेरी बातों में तब असर आया
करने इजहार अपनी प्रेयसी से
जमीं पर आसमां उतर आया।।

- मौलिक व अप्रकाशित

Added by atul kushwah on February 15, 2014 at 11:30pm — 13 Comments

मगर फिर चार दिन की ये जवानी कौन देता है...

पहले मौत दे, फिर जिंदगानी कौन देता है

मुकम्मल हो सके ऐसी कहानी कौन देता है,

यहां तालाब और नदियां कई बरसों से सूखी हैं

खुदा जाने कि पीने को ये पानी कौन देता है,

हमें तो जिंदगी ठहरी हुई इक झील लगती है

मगर हर वक्त दरिया को रवानी कौन देता है,

जमीं से आसमां तक का सफर हम कर चुके लेकिन

नहीं मालूम मंजिल की निशानी कौन देता है,

परिंदे जानते हैं ये कि पर कटने का खतरा है

इन्हें फिर हौसला ये आसमानी कौन देता…

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Added by atul kushwah on January 17, 2014 at 9:30pm — 15 Comments

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