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लगता है ये त्योहारों का मौसम है..

खुशूबू हैं संगीत हवाएं सरगम हैं

ये आंसू की बूंद नहीं ये शबनम है.

सूरज जब भी ड्यूटी करके घर लौटा
अंधकार में डूबा सारा आलम है,

बडे—बडे तैराक डूबते देखे हैं,
बचकर रहना उसकी आंखें झेलम हैं,

तुम क्या जानो अश्क कहां से आते हैं
उनसे पूछो जिनकी आंखों में गम है,

चौराहों पर पुलिस, लोग सहमे—सहमे
लगता है ये त्योहारों का मौसम है।।


- मौलिक व अप्रकाशित

@ अतुल कुशवाह

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 10, 2014 at 4:46pm

तुम क्या जानो अश्क कहां से आते हैं
उनसे पूछो जिनकी आंखों में गम है,

बहुत बढ़िया i बधाई हो i

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 9, 2014 at 3:21pm

आदरणीय इस रचना पर मेरी तरफ से हार्दिक बढ़ाई स्वीकार करें सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 8, 2014 at 9:47pm

प्रयास के लिये बधाई आदरणीय अतुल जी

Comment by atul kushwah on October 8, 2014 at 6:08pm


आदरणीय राम अवध सर, बहुत—बहुत आभार आपका। भविष्य में इस ध्यान रखूंगा। सादर

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on October 8, 2014 at 2:25pm

आदरणीय कुशवाह जी अच्छी गजल कहने के लिये बधाई। गजल में रदीफ का पालन सही तौर पर किया जाता है तो फिर क्या कहना था। फिर भी गजल अच्छी है एक बार पुनः बधाई

कृपया ध्यान दे...

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