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ग़ज़ल -- कहानियों में हक़ीक़त नहीं हुआ करती

जो दिल कहे वो ज़रूरत नहीं हुआ करती
कहानियों में हक़ीक़त नहीं हुआ करती

तुम्हें गुरेज़ नहीं है यही सबब तो नहीं
बिना फरेब सियासत नहीं हुआ करती

ज़बान दे के पलटना उन्हें मुबारक हो
मैं ख़ुश हूँ, मुझसे तिज़ारत नहीं हुआ करती

मैं कैसे झूठ को सच और सच को झूठ कहूँ
कि एक दिन में ये आदत नहीं हुआ करती

जो चंद पैसों में ईमान बेच देते हैं
उन्हें किसी से रिफ़ाक़त नहीं हुआ करती

वो नामचीन हुए कल जो तिफ्ले-मकतब थे
कभी फ़ुज़ूल मशक़्क़त नहीं हुआ करती

'दिनेश' तू ये ज़माने का ढंग अपना ले
शरीफ़ लोगों की इज़्ज़त नहीं हुआ करती


--- दिनेश कुमार २८/०१/२०१५

( मौलिक व अप्रकाशित )

अरकान -- १२१२ ११२२ १२१२

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Comment by khursheed khairadi on February 3, 2015 at 9:39am

ज़बान दे के पलटना तुम्हें मुबारक हो
मैं ख़ुश हूँ, मुझसे तिज़ारत नहीं हुआ करती

मैं कैसे झूठ को सच और सच को झूठ कहूँ
कि एक दिन में ये आदत नहीं हुआ करती

आदरणीय दिनेश जी उम्दा और मयारी ग़ज़ल हुई है ,शेर दर शेर दाद कबूल फरमावें |मक्ते की शेरियत लासानी है, मतले ने सभी अशहार को अच्छी रवानी दे है  |सादर अभिनन्दन |


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Comment by गिरिराज भंडारी on February 1, 2015 at 12:12pm

कभी अनाड़ी था वो आज नामी शायर है
कभी फ़ुज़ूल मशक़्क़त नहीं हुआ करती          --------- बहुत सही बात कही आदरणीय दिनेश भाई , गज़ल के लिये ढेरों दाद ।

Comment by ram shiromani pathak on February 1, 2015 at 10:16am
ज़ोरदार ग़ज़ल आदरणीय हार्दिक बधाई आपको।।सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 1, 2015 at 9:41am

कहानियों में हक़ीक़त नहीं हुआ करती
बिना फरेब सियासत नहीं हुआ करती-  बहुत खूब ये मतला मौजूदा राजनीतिक विचाराधारा पर चोट करता हुआ दिखता है

ज़बान दे के पलटना तुम्हें मुबारक हो
मैं ख़ुश हूँ, मुझसे तिज़ारत नहीं हुआ करती-   बेहतरीन वाह

मैं कैसे झूठ को सच और सच को झूठ कहूँ
कि एक दिन में ये आदत नहीं हुआ करती-  लाजवाब

जो चंद पैसों में ईमान बेच देते हैं
उन्हें किसी से रिफ़ाक़त नहीं हुआ करती - बहुत खूब कड़वा किन्तु सच

कभी अनाड़ी था वो आज नामी शायर है
कभी फ़ुज़ूल मशक़्क़त नहीं हुआ करती - वाह वाह वाह वाह वाकई ग़ज़लगोई आसान नहीं

'दिनेश' तू भी ज़माने का ढंग अपना ले
शरीफ़ लोगों की इज़्ज़त नहीं हुआ करती- क्या खूब कहा है आदरणीय दिनेश जी आपने

हर शेर ने मुतास्सिर किया है दिली दाद कुबूल फरमायें

Comment by somesh kumar on January 30, 2015 at 10:52pm

दिनेश' तू भी ज़माने का ढंग अपना ले
शरीफ़ लोगों की इज़्ज़त नहीं हुआ करती|

क्या कटू सत्य है इस गज़ल में ,हार्दिक बधाई |

Comment by umesh katara on January 29, 2015 at 7:52pm

वाह वाह

Comment by दिनेश कुमार on January 29, 2015 at 6:42pm
मंच के आदरणीय साथियों का मुझ नाचीज़ की हौसला अफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया। भाई मिथिलेश जी, आखिरी से पहला शे'र आप के लिये ही था। आदरणीय बागी सर जी वजन अपडेट करता हूँ।
Comment by Hari Prakash Dubey on January 29, 2015 at 5:58pm

आदरणीय दिनेश जी खूबसूरत ग़ज़ल .....

मैं कैसे झूठ को सच और सच को झूठ कहूँ

कि एक दिन में ये आदत नहीं हुआ करती...वाह... हार्दिक बधाई , सादर !

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on January 29, 2015 at 5:51pm

Behad khoobsurat gazal...Dil ko chho gayi Bhai Dinesh Kumarji.

Comment by नादिर ख़ान on January 29, 2015 at 3:54pm

आदरणीय दिनेश जी खूबसूरत गज़ल के लिए मुबारकबाद .....

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