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दोपहर में घंटी बजने पर उसने दरवाजा खोला तो वो दरिंदा जबरदस्ती अंदर घुस आया और उसकी अस्मिता को तार तार कर गया | अब शरीर तो जिन्दा बच गया लेकिन आत्मा बुरी तरह लहूलुहान थी | एक ऐसा हादसा जिसके लिए जिम्मेदार वो नहीं थी लेकिन भुगतना उसी को था |
पति ने आने पर जब सँभालने की कोशिश की तो उसे झटक कर वह जोर से रो पड़ी , शायद अब वो किसी पुरुष पर भरोसा नहीं कर पाएगी | एक वहशी की गलती की सज़ा अब पूरे पुरुष समाज को भुगतनी होगी |

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मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on February 6, 2015 at 2:24am

बहुत बहुत आभार आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी | रचना पर अपने विचार रखने के लिए धन्यवाद | आप लोगों की टिप्पणी पाकर लिखना सफल हुआ |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 6, 2015 at 1:33am

उत्कृष्ट और सफल लघुकथा, इस विषय पर बयानबाजी अधिक और रचनाकर्म कम होता है लेकिन आपने जिस संतुलित ढंग से विषय को सटीक तरीके से लघुकथा में व्यक्त किया है, उसके लिए हृदय से बधाई प्रेषित हैआदरणीय विनयजी. शेष आदरणीय सौरभ सर का आशीर्वाद आपको मिल ही गया है, 

Comment by विनय कुमार on February 6, 2015 at 12:44am

बहुत बहुत आभार आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी | सबसे पहले मैं अभिभूत हूँ अपनी लघुकथा पर आपकी इतनी सारगर्भित और विस्तृत टिप्पणी पाकर | आप बिलकुल सच कह रहे हैं कि दैहिक सुचिता जैसी कोई अवधारणा नहीं होनी चाहिए लेकिन समाज ने कुछ ऐसी धारणाएं बना डाली हैं जिससे बाहर निकलने में बहुत समय लगेगा | किसी भी व्यक्ति को किसी ऐसे गुनाह कि सजा कैसे दी जा सकती है जो गुनाह उसने किया ही नहीं हो , लेकिन ऐसे मामलों में स्त्री सजा भुगतती है | अफ़सोस ये भी है कि इस मनोस्थिति को जिसे सबसे ज्यादा समझना चाहिए , वही , यानी कि बाक़ी स्त्रियां , ही नहीं समझती हैं |
ऐसे अपराधों का विरोध करने के लिए कभी कभी स्त्री ,चाहे अनचाहे ऐसी स्थिति में पहुँच जाती है जहाँ उसके लिए सारा पुरुष समाज ही अपराधी हो जाता है | यहाँ भी बाक़ी सारा पुरुष समाज अनजाने में ही दोषी बन जाता है | एक बार पुनः आपका

आभार |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 5, 2015 at 11:44pm

आदरणीय भाई विनयजी, आपकी इस लघुकथा के माध्यम से जिसतरह से बलत्कृता के मनोवैज्ञानिक पक्ष को सशकत ढंग से उभारा गया है उसके लिए आप अवश्य ही बधाई के पात्र हैं. जिस घटना पर किसी स्त्री का कोई बस नहीं, उस घटना केहो जाने पर इसकी सज़ा जिस तरह से वह भुगतती है, यह कुछ और नहीं इस समाज की सोच में पैठ चुकी अतार्किक विकृति का ही नतीजा है.

मैं तो दैहिक शुचिता की पूरी अवधारण को ही ख़ारिज़ करता हूँ. स्थूल शरीर वस्तुतः सूक्ष्म शरीर या अन्तःकरण के सभी अवयवों की दशाओं का प्रस्फुटीकरण (manifestation) होता है. यानि जबतक कोई मन शुद्ध है, शरीर अशुद्ध हो ही नहीं सकता. हम इस राष्ट्र के प्राचीन वांग्मय देखें तो यही ज्ञात होता है कि शरीर को लेकर कोई मंतव्य कभी इतना लिजलिजा एवं इतना अतर्किक नहीं रहा है. लेकिन बाद की सोच और परिपाटियों का कुप्रभाव हमारी सोच और समझ पर ऐसा पड़ा है कि अन्यथा शुचिता हमारी सोच का अनन्य हिस्सा बन गयी.
आपकी इस प्रस्तुति के लिए पुनः हार्दिक बधाई.

मुझे फिल्म ’घर’ का वह दृश्य याद आ गया जहाँ रेखा ने बलत्कृता के पात्र को एनेक्ट करने के क्रम में पति विनोद मेहरा को एक तरह से अपने से दूर कर लिया था. बाद की फिल्म दोनों पात्रों के बीच पुनर्प्रतिस्थापित होती हुई समरसता को प्रस्तुत करती है. ऐसे कॉम्प्लिकेटेड विषय पर यह ’घर’ एक बहुत ही सशक्त फिल्म थी.

शुभेच्छाएँ

Comment by विनय कुमार on February 5, 2015 at 8:59pm

बहुत बहुत आभार आदरणीया राजेश कुमारी जी | आपकी सारगर्भित टिप्पणी से लिखना सार्थक हुआ |

Comment by विनय कुमार on February 5, 2015 at 8:58pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी | इस घटना के बाद पुरुषों के प्रति उपजे अविश्वास के चलते उसने पति को झटक दिया और अपनी बेबसी पर रो पड़ी | धन्यवाद आपकी प्रतिक्रिया के लिए..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 5, 2015 at 8:39pm

एक कटु सच्चाई है आपकी इस लघु कथा में ....यही कारण है ऐसी घटनाओं के बाद मनोचिकित्सकों की आवश्यकता होती है एक स्त्री की मनोस्थिति को बखूबी समझा रही है लघु कथा ...जिसके लिए आप बधाई के पात्र हैं |

Comment by Hari Prakash Dubey on February 5, 2015 at 4:00pm

मोहन बेगोवाल जी की बात से सहमत हूँ ,विनय जी बात कुछ अधूरी रह गई थी , तब तक पोस्ट हो गया .....सुन्दर रचना ! 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 5, 2015 at 3:54pm

 आदरणीय विनय जी......आत्मा बुरी तरह लहूलुहान थी...बधाई  , रचना सुन्दर ,सार्थक है ........पति ने आने पर जब सँभालने की कोशिश की तो उसे झटक कर वह जोर से रो पड़ी.........ये क्यों हुआ ?....

Comment by विनय कुमार on February 4, 2015 at 7:06pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय मोहन बेगोवाल जी .वज़ह तो सिर्फ इंसान की पाशविकता ही होती है इन मामलों में..

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