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ठसक तेरी मेरी गैरत के आपस में उलझने से
मुहब्बत लुट गयी अपनी दिलों में जह्र पलने से
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दगाबाजी से अच्छा तो अलग होना मुनासिब था
बफाओं के बिना क्या है सफर में साथ चलने से
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मेरा घर अपने हाथों से कभी मैंने जलाया था
नहीं लगता मुझे अब डर किसी का घर भी जलने से
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तू पत्थर है मुझे हरबार चकनाचूर करता है
मैं सीसा हूँ मुझे अफसोस क्या होगा बिखरने से
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रहा ता- उम्र मैं हर्फे-गलत बेज़ार सा यारो
सुकूँ मिलने लगा है अब मुझे तनहाई मिलने से
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उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित
Comment
शुक्रिया Hari Prakash Dubey ji
आदरणीय उमेश कटारा जी////तू पत्थर है मुझे हरबार चकनाचूर करता है
मैं सीसा हूँ मुझे अफसोस क्या होगा बिखरने से॥ वाह .../// बहुत शानदार रचना , बधाई, सादर।
शुक्रिया Dr Ashutosh Mishra जी
आदरणीय उमेश जी इस उम्दा ग़ज़ल के लिए हार्डक बधाई सादर
गजल को पसन्द किया आपका तहेदिल से आभार Samar kabeer जी
आभारमिथिलेश वामनकर जी
गजल को पसन्द किया आपका तहेदिल से आभार डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव ji
तू पत्थर है मुझे हरबार चकनाचूर करता है
मैं सीसा हूँ मुझे अफसोस क्या होगा बिखरने से------- क्या बात है i अति सुन्दर i
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