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आम्र मंजरी झूमती ,मादक महके बाग

-हर्षित कोयल कूकती,बौराया सा काग ।

 

बाबा देवर बन गए, फागुन में वो बात

ललचाये हर बाल मन,रंगों की बारात ।

 

नई कोपलें भर रहीं,जीवन में मकरंद

लहक रही मद कामनी,उर में भर आनंद ।

 

लाल टिकुलिया चाँद सी,कजरारे से नैन

बतियाने पनघट लगे ,फागुन गाती रैन ॥    

मौलिक व अप्रकाशित 

कल्पना मिश्रा बाजपेई 

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Comment by khursheed khairadi on February 25, 2015 at 9:53am

आदरणीया कल्पना जी ,सुन्दर दोहावली हेतु हार्दिक आभार ,सादर अभिनन्दन |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 24, 2015 at 11:59pm
लाल टिकुलिया चाँद सी, तारों से दो नैन।
बतियाते पनघट नदी, फागुन गाती रैन।।
.
आदरणीया कल्पना जी सुन्दर दोहावली पर हार्दिक बधाई निवेदित है।
Comment by maharshi tripathi on February 24, 2015 at 10:32pm

सुन्दर दोहों के लिए आपको बधाई आ.कल्पना जी |

Comment by kalpna mishra bajpai on February 24, 2015 at 6:51pm

आ०Shyam Narain Verma सर आभार /सादर  

Comment by kalpna mishra bajpai on February 24, 2015 at 6:51pm

आ ० डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर आप की सराहना और सलाह के लिए मैं तहे दिल से आभारी हूँ /सादर 

Comment by Shyam Narain Verma on February 24, 2015 at 12:49pm
सुंदर दोहों की बधाई, पूरे मन से ॥
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 24, 2015 at 12:09pm

आ० बाजपेयी जी

बहुत भावपूर्ण दोहे है i शिल्प में थोडा सा बिखराव है i  मैं कुछ कोशिश करता हूँ -

आम्र मंजरी झूमती ,मादक महके बाग

कोयल कूक हर्षित हुई,बौराया सा काग ।-------हर्षित कोयल कूकती

 

बाबा देवर बन गए, फागुन में वो बात

ललचाये हर बाल मन,रंगों की बारात ।------------------- अति सुन्दर

 

नई कोपलें भर रहीं,जीवन में मकरंद

लहक रही मद कामनी,जियरा भर आनंद ।------------लहक रही मद कामिनी  उर में भर आनंद

 

लाल टिकुलीया चाँद सी,कजरारे से नैन-----------टिकुलिया

बतियाने पनघट लगे ,फागुन गाती रैन ॥    

 फिलहाल सुन्दर प्रयास i आपको बधाई i सादर i

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