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उलझी हुयी प्रेमकहानी

मैं एक कवि हूँ 
मुझे प्रेम है 
पहाडों से 
नदी से
सागर में उठती हुयी लहरों से
गिरते हुये झरनों से
सुन्दर सुन्दर फूलों 
की महक से
मीठी मीठी 
पंछियों की चहक से
मैं एक कवि हूँ 
मुझे प्रेम है 
बंजड हुये उस पेड से
जिसने कभी छाया दी थी 
फल दिये 
मुझे प्रेम है
उन तेज नुकीले काँटे से
जिसने खुद को सुखाकर 
फूल को खिलाया 
मुझे जितना सुख से प्रेम है 
उतना ही प्रेम दुख से है
तुम कहती हो 
मैं प्रेमी नहीं हो सकता 
क्योंकि मैं कवि हूँ
ये कैसी व्याख्या है 
तुम्हारी प्रेम की
एक कवि जो प्रकृति की 
बनायी हुयी हरेक रचना में 
प्रेम की तलाश करता है
प्रकृति की हर रचना से
प्रेम करता है
वो प्रेमी नहीं हो सकता है
बडी ही उलझी हुयी है
तुम्हारी प्रेम की परिभाषा
या फिर
उलझी हुयी है मेरी प्रेम कहानी

उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित 

Views: 630

Comment

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Comment by umesh katara on February 28, 2015 at 6:33pm
Comment by umesh katara on February 28, 2015 at 6:32pm

krishna mishra 'jaan'gorakhpuri जी आपको रचना पसन्द आई बहुत शुक्रिया

Comment by Hari Prakash Dubey on February 28, 2015 at 9:47am

आदरणीय उमेश कटारा जी ,बडी ही उलझी हुयी है 
तुम्हारी प्रेम की परिभाषा 
या फिर 
उलझी हुयी है मेरी प्रेम कहानी....सुन्दर रचना ! बधाई प्रेषित .

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 28, 2015 at 9:07am

सुन्दर कविता के लिए साधुवाद!!आ० उमेश जी

Comment by umesh katara on February 27, 2015 at 7:36pm

maharshi tripathi जी आपको रचना पसन्द आई बहुत शुक्रिया

Comment by umesh katara on February 27, 2015 at 7:35pm

डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी आपको रचना पसन्द आई बहुत शुक्रिया

Comment by maharshi tripathi on February 27, 2015 at 4:36pm

एक कवि जो प्रकृति की 
बनायी हुयी हरेक रचना में 
प्रेम की तलाश करता है
प्रकृति की हर रचना से 
प्रेम करता है ,,,,,,,,,,,,वाह !!कवि की सही  पहचान आपको हार्दिक बधाई |

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 27, 2015 at 12:57pm

ये कैसी व्याख्या है 
तुम्हारी प्रेम की
एक कवि जो प्रकृति की 
बनायी हुयी हरेक रचना में 
प्रेम की तलाश करता है
प्रकृति की हर रचना से
प्रेम करता है
वो प्रेमी नहीं हो सकता है------------------बहुत सुन्दर ------कटारा जी

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