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आम  हूँ  बौरा रहा हूँ

पीर में  मुस्का रहा हूँ

मैं नहीं दिखता बजट में

हर  गज़ट पलटा रहा हूँ  

फल रसीले बाँट कर बस

चोट को सहला रहा हूँ

गुठलियाँ किसने गिनी हैं

रस मधुर बरसा रहा हूँ

होम में जल कर, सभी की

कामना पहुँचा रहा हूँ

द्वार पर तोरण बना मैं

घर में खुशियाँ ला रहा हूँ

कौन पानी सींचता है

जी  रहा खुद गा रहा हूँ

मीत उनको “कल” मुबारक

“आज” मैं जीता रहा हूँ

“खास” का अस्तित्व रखने

“आम” मैं कहला रहा हूँ

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

 

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Comment by मिथिलेश वामनकर on March 1, 2015 at 7:26pm

आम  हूँ  बौरा रहा हूँ

पीर में  मुस्का रहा हूँ......... वाह वाह वाह अरुण सर कमाल का मतला हुआ है... मिसरा-ए-उला तो बस दिल लूट गया आम और बौराना बहुत सुन्दर .... दोनों अर्थ ही बहुत सुन्दर ....

मैं नहीं दिखता बजट में

गज़ट पढ़ते जा रहा हूँ  ............. वाह वाह सर, क्या बात कही है !

द्वार पर तोरण बना मैं

घर में खुशियाँ ला रहा हूँ......... वाह वाह ... सच कहा है 

मीत उनको “कल” मुबारक

“आज” मैं जीता रहा हूँ.............. बहुत अच्छा शेर .. बेहतरीन कटाक्ष 

आदरणीय अरुण निगम सर इस बेहतरीन और उम्दा ग़ज़ल पर हार्दिक बधाई 

Comment by दिनेश कुमार on March 1, 2015 at 7:11pm
वाह आदरणीय अरुण जी, ग़ज़ल के माध्यम से सच्चाई सामने लाये हो। दिल से दाद कबूल कीजिए।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 1, 2015 at 7:02pm

आ 0 अरुण जी

बहुत ही सुन्दर गजल / आम हूँ बौरा  रहा हूँ / फिर / खास” का अस्तित्व रखने

“आम” मैं कहला रहा हूँi आपकी गजल विद्वतापूर्ण है i सादर i

Comment by maharshi tripathi on March 1, 2015 at 6:39pm

वाह ,,कविता के माध्यम से आम की पीड़ा आप ही कह सकतें है ,,,बहुत सुन्दर रचना पर आपको ढेरों बधाई आ.अरुण निगम जी |

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