बह्र : २१२२ १२१२ २२
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फ़स्ल कम है किसान ज़्यादा हैं
ये ज़मीनें मसान ज़्यादा हैं
टूट जाएँगे मठ पुराने सब
देश में नौजवान ज़्यादा हैं
हर महल की यही कहानी है
द्वार कम नाबदान ज़्यादा हैं
आ गई राजनीति जंगल में
जानवर कम, मचान ज़्यादा हैं
हाल क्या है वतन का मत पूछो
गाँव कम हैं प्रधान ज़्यादा हैं
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(मौलिक एवम् अप्रकाशित)
Comment
शुक्रिया krishna mishra जी
शुक्रिया Hari Prakash Dubey जी
शुक्रिया मिथिलेश वामनकर जी
बहुत बहुत शुक्रिया MAHIMA SHREE जी
आदरणीय योगराज जी, एवं बागी जी आपने बिल्कुल दुरुस्त फ़रमाया है। काफ़िया के नियमों के अनुसार किसान और मसान हमकाफ़िया नहीं हो सकते। इस संबंध में योगराज जी बिल्कुल सही हैं कि यहाँ हर्फ़े रवी ‘स’ है और इसके पहले स्वर साम्य नहीं है। पर कई शायरों ने ये छूट ली है जैसे इकबाल साहब की ये ग़ज़ल देखें।
और मैं भी बहुत मज़बूर होकर यदा कदा ली गई इस छूट का इस्तेमाल कर रहा हूँ। सामन्यतया मेरा प्रयास रहता है कि मैं ये छूट न लूँ पर यहाँ बह्र छोटी है और काफ़िया तंग है। इसलिए।
आ गई राजनीति जंगल में
जानवर कम, मचान ज़्यादा हैं
वाह... सही कहा आप ने आदरणीय धर्मेन्द्र जी !
आ गई राजनीति जंगल में
जानवर कम, मचान ज़्यादा हैं
हाल क्या है वतन का मत पूछो
गाँव कम हैं प्रधान ज़्यादा हैं
बहुत खूब कहा आदरणीय धर्मेन्द्र जी
सच्ची गज़ल ,अच्छी गज़ल |
सुन्दर गजल के लिए बधाई!भाई धर्मेन्द्र..
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