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महिला दिवस पर रचित -

घनाक्षरी – 16-15 वर्ण

कंधें से कंधा मिला काम करे जो खेत में,

भोर में उठ, देर रात तक जगती है |

 

खुद का वजूद भूल मान रखे आदमी का,

सर्वस्व समर्पण को तैयार रहती है |

 

शादी कर अनजान घर बसाने, कोख में,

नौ माह तक पीड़ा भी सहती रहती है |

 

फिर भी स्वयं का नही कोई वजूद मानती,

नाम बच्चें को भी वह बाप का ही देती है |

 

सर्दी गर्मी वर्षा सहती अंग भी झुलसाती,

दूजे घर काम से पाई पाई जोडती है |

 

व्रत है कहकर खुद तो भूखी ही सोती,

अपने पति और बच्चों को खाना देती है | 

 

देवी मान पूजते पर, अबला ही मानते,

कष्ट सहकर भी नौकरी जो करती है |

 

बेबसी में जमीदार के द्वारें ब्याज में ही ,

आँचल से मुहं ढापे, लाज बेच जाती है |

(मौलिक अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 16, 2015 at 10:42am

रचना  सराहने के लिए आपका हार्दिक आभार  श्री गिरिराज भंडारी जी |

सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 15, 2015 at 8:50am

आदरणीय लक्ष्मण रामानुज भाई ,  नारी शक्ति को समर्पित आपकी रचना बहुत सुन्दर लगी । हार्दिक बधाइयाँ स्वीकारें ।

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 14, 2015 at 12:18pm

 रचना  पर उत्साहवर्धन करती टिपण्णी के लिए हार्दिक आभार आपका श्री खुर्शीद खैराडी जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 14, 2015 at 12:03pm

रचना के भाव पसंद करने के लिए हार्दिक आभार आपका श्री लक्ष्मण धामी  जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 14, 2015 at 12:02pm

रचना सराहने  के  लिए हार्दिक  आभार श्री शिज्जू "शकूर" भाई | घनाक्षरी पर पहला प्रयास  है, मै इसपर विश्लेष्णात्मक टिपण्णी की ही प्रतीक्षा कर रहा था | गेयता की ओर ध्यान आकृष्ट करने  के लिए शुक्रिया 

Comment by khursheed khairadi on March 14, 2015 at 9:25am

सर्दी गर्मी वर्षा सहती अंग भी झुलसाती,

दूजे घर काम से पाई पाई जोडती है |

 

व्रत है कहकर खुद तो भूखी ही सोती,

अपने पति और बच्चों को खाना देती है | 

 आदरणीय लडीवाला जी ,नारी-शक्ति को समर्पित सुन्दर रचना हुई है |सादर अभिनन्दन |

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 13, 2015 at 4:06pm

रचना सराहने के लिये हार्दिक आभार आपका श्री (डॉ) विजय शंकर जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 13, 2015 at 4:03pm

  शुक्रिया श्री Shyam Mathpal जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 13, 2015 at 4:00pm

उत्साह्वर्धन के लिए हार्दिक आभार आपका श्री श्याम नारायण वर्मा जी और श्री महार्षित त्रिपाठी जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 13, 2015 at 3:58pm

हार्दिक आभार आपका श्री हरी प्रकश दुबे जी और श्री कृष्ण मिश्रा “जान गोरखपुरी” जी 

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