2122 2212 1222
लोग मिलते हैं अक्सर यहाँ मुहब्बत से
दिल हैं मिलते यारब बड़े ही मुद्दत से।
आज कल शामें हैं उदास बेवा सी
याद आये है कोई खूब सिद्दत से।
कोई होता है किस कदर अदाकारां
हम रहे इक टक देखते सौ हैरत से।
उसने मुझको यूँ शर्मसां किया बेहद
पेश आया मुझसे बड़े ही इज्जत से।
लबसे तेरे हय शोख़ गालियाँ जाना
बस रहे हम ता-उम्र सुन ते लज्ज़त से।
बारहाँ पटके है उसी के दर पे सर
बाज आये ना हम खुदाया उल्फ़त से।
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मौलिक व् अप्रकाशित (c) ‘जान’ गोरखपुरी
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Comment
आदरणीय कृष्णा भाई , ग़ज़ल अच्छी हुई है , हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें ।
बस मिसरों मे स्वाभाविक प्रवाह नही लग रहा है , बह्र को किसी तरह निभाने की कोशिश दिख रही है , मेरे ख़्याल से आपको गज़ल को और समय देना चाहिये था , पोस्ट करने से पहले ।
बड़े मुद्दत या बड़ी मुद्दत ? अदाकारां या अदाकारा , ? शर्मसां या शर्मसार ,बारहाँ या बारहा । ज़रा देख लीजियेगा ।
अच्छी गजल रचना के लिए बधाई श्री कृष्ण मिश्रा "जान गोरखपुरी" जी
बहुत सुन्दर ग़ज़ल! आपको हार्दिक बधाई! |
आज कल शामें हैं उदास बेवा सी
याद आये है कोई खूब सिद्दत से।,,,,वाह !! आ. बड़े भाई krishna mishra 'jaan'gorakhpuri जी ,,खूबसूरत गजल पर ढेरो बधाई आपको |
सुन्दर गजल
बधाई हो . स्नेह .
भाई कृष्ण मिश्रा जी,
बारहाँ पटके है उसी के दर पे सर
बाज आये ना हम खुदाया उल्फ़त से।...बहुत बढ़िया , हार्दिक बधाई !
आदरणीय कृष्ण मिश्रा जी,
दिल को छू गई .बधाई
वाह वाह .. सुन्दर भाव .. मनमोहक रचना हुई
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