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गौरैया दिवस पर कुछ दोहे

आँगन के ऊपर बना ,सरिया का आकाश
दाना नीचे है पड़ा खा पाती मैं काश ॥

अंबर पर उड़ते मिले ,चतुर सयाने बाज
जीवन कितना है कठिन ,हम जैसों का आज ॥ 

सूरज दादा भी तपें ,करें गज़ब का खेल
सूख गए वन बावड़ी,बची न कोई बेल ॥

एक दिवस में क्या मिले,कैसे रखलूँ धीर
सोच सोच ये बात को,मन में उठती पीर ॥

मन करता है आज भी,आँगन फुदकूँ जाय
झूला झूलूँ तार पर......मुन्नी लख हर्षाय ॥

अप्रकाशित व मौलिक 

कल्पना मिश्रा बाजपेई 

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Comment by kalpna mishra bajpai on March 26, 2015 at 9:21am

आदरणीय vijay nikore सर आप का हार्दिक आभार /सादर 

Comment by vijay nikore on March 24, 2015 at 11:03am

बहुत ही सुन्दर दोहे। बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 23, 2015 at 8:56am

आदरणीया कल्पना जी बहुत सुन्दर दोहावली हुई है. गौरैया के बहाने से कुछ विशिष्ट बातें साझा हुई है. इस सार्थक दोहावली के लिए बहुत बहुत बधाई . 

इस दोहे में कमाल की व्यापकता है 

एक दिवस में क्या मिले,कैसे रखलूँ धीर 
सोच सोच ये बात को,मन में उठती पीर ॥

सोच सोच ये बात को के स्थान पर सोच सोच इस बात को किया जाये तो कैसा रहेगा. मेरे निवेदन पर विचारिएगा. सादर 

Comment by kalpna mishra bajpai on March 23, 2015 at 8:12am

आ0 Hari Prakash Dubey जी आप का आभार /सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on March 23, 2015 at 12:36am

आदरणीया कल्पना मिश्रा जी ,सुन्दर दोहे ,सुन्दर रचना ,हार्दिक बधाई आपको ! सादर 

एक दिवस में क्या मिले,कैसे रखलूँ धीर 
सोच सोच ये बात को,मन में उठती पीर ॥....बहुत सुन्दर 

Comment by kalpna mishra bajpai on March 22, 2015 at 10:12pm

आ० Er. Ganesh Jee "Bagi" सर हार्दिक आभार /सादर 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 22, 2015 at 8:45pm

आदरणीया कल्पना जी, सभी दोहें एक से बढ़कर एक लगें, एक दोहा कोट करना चाहूँगा जिसका विस्तार बहुत ही व्यापक है, बहुत बहुत बधाई इस प्रस्तुति पर.

एक दिवस में क्या मिले,कैसे रखलूँ धीर 
सोच सोच ये बात को,मन में उठती पीर ॥

Comment by kalpna mishra bajpai on March 21, 2015 at 9:48pm

आ०  maharshi tripathi जी आभार आप का 

Comment by kalpna mishra bajpai on March 21, 2015 at 9:47pm

आ० Shyam Narain Verma सर आभार आप का 

Comment by kalpna mishra bajpai on March 21, 2015 at 9:47pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर मांफ़ी चाहती हूँ ./ 

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