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कहीं दूर निकल जाएँगे : हरि प्रकाश दुबे

दो विदाई, अब तो कहीं दूर निकल जाएँगे ,

अब तो ये गीत कहीं और जा के गाएँगे !

आदमी कुछ भी नहीं, एक एहसास तो है,

शुन्य जैसा ही सही, एक आकाश तो है !  

टूटा बिखरा हो कहीं, एक विश्वास तो है,

इस हक़ीकत को हम ,अब न भुला पायेंगे !

दो विदाई, अब तो कहीं दूर निकल जाएँगे ,

अब तो ये गीत कहीं और जा के गाएँगे !!  

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Hari Prakash Dubey on March 28, 2015 at 5:33pm

आपका  बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया वंदना जी  ! सादर 

Comment by vandana on March 28, 2015 at 5:30pm

टूटा बिखरा हो कहीं, एक विश्वास तो है,

इस हक़ीकत को हम ,अब न भुला पायेंगे

वाह बहुत खूब आदरणीय बहुत सुन्दर 

Comment by Hari Prakash Dubey on March 28, 2015 at 5:26pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी सर आपका बहुत - बहुत धन्यवाद ! सादर आपका आशीर्वाद मिल गया ,रचना सार्थक हुई ! सादर !

Comment by Hari Prakash Dubey on March 28, 2015 at 5:25pm

आदरणीय डा. आशुतोष मिश्रा जी आपका बहुत - बहुत धन्यवाद ! सादर

Comment by Hari Prakash Dubey on March 28, 2015 at 5:24pm

सोमेश भाई, आपका  हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ ,हार्दिक धन्यवाद !

Comment by Hari Prakash Dubey on March 28, 2015 at 5:23pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर , प्रोत्साहन हेतु आपका हार्दिक आभार ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on March 28, 2015 at 5:22pm

आदरणीय श्याम मठपाल जी , रचना की सराहना करने के लिए आपका ह्रदय तल से आभार ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on March 28, 2015 at 5:21pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव सर ,आपका बहुत आभार  ! सादर !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 25, 2015 at 10:01pm

आदरणीय हरि भाई , सुन्दर द्विपदियों के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 25, 2015 at 4:04pm

सुंदर भावों से सजी इस रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर 

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