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दो लघुकथाएँ - (अम्बेदकर जयंती पर)

(१). बदरंग संवेदनाएँ

"घोषणा करवा दो कि कल हम पूरा दिन अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे।"    
"क्यों नेता जी ? कल तो कोई व्रत उपवास भी नहीं है।"
"अरे कल अम्बेदकर जयंती है न, पता नहीं किस किस बस्ती में जाना पड़ जाए ।"  
------------------------------------------------------------------------------
(२). सफ़ेद साँप

"आज तो स्पेशल जश्न होना चाहिए।"
"तो भेजें किसी को दारू सिक्का लाने ?"
"दारू सिक्के के साथ साथ मेरे लिए नत्थू की लौंडिया पकड़ कर लायो।"
"अरे नेता जी, आपको पता है न नत्थू किस जात का है ?" 
"अबे चुप !! ऐसा बोलेगा तो बाबा साहेब की आत्मा को कष्ट पहुँचेगा।"
--------------------------------------------------------------------------

(मौलिक/अप्रकाशित)

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 15, 2015 at 8:48pm

दोनों ही लघुकथा बेहद ही उम्दा,माइक्रोस्कोपिक दृष्टि से लिखी गयी कथा का बेहतरीन उदाहरण!

Comment by विनय कुमार on April 15, 2015 at 8:47pm

आप की रचना पर कुछ कहना मतलब वाह ही करना | जबरदस्त लघुकथाएँ और उनका असर बहुत ही तीछ्ण | बहुत कुछ सीखते हैं हम लोग इन रचनाओं से , सादर नमन आदरणीय | 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 15, 2015 at 7:48pm

दोनों लघुकथाएं बहुत उम्दा लगी ,सर. यह सिर्फ आज ही नहीं ,सदा से चले आ रहे जातिवाद को आइना दिखा रहीं है. बहुत-बहुत बधाई,आदरणीय योगराज जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 15, 2015 at 6:40pm

आदरणीय योगराज भाई , दोनो लघु कथा दो विरोधी आचरन को बताने मे पूरी तरह सफल रहीं । दो धारी तलवार की तरह मारक लगीं ।

आपको हार्दिक बधाई ॥

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 15, 2015 at 6:25pm
आदरणीय योगराज प्रभाकर जी , निसंदेह दोनों लागु-कथाएं स्वयं में पूर्ण हैं और हालात पर जबरदस्त कटाक्ष करतीं हैं. दोनों के शीर्षक भी बहुत प्रभावी हैं। बहुत बहुत बधाई, सादर।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 15, 2015 at 6:06pm

अ० अनुज

लघु कथा  आपकी हो तो कुछ कहने की गुन्जाईश ही कहाँ रहती है  i दोनों ही कथाये  एक से बढ़कर एक हैं . सादर .

Comment by shashi bansal goyal on April 15, 2015 at 5:35pm
योगराज जी दोनों लघुकथाएँ मारक हैं ।जब पेट की भूख की बात थी तो जाति याद आ गई पर जैसे ही बात शरीर की भूख की आई तो सब जातिवाद निकल गया ।ये है नेताओं का असली चेहरा । वोट चाहिए तो पूजा । जीते तो उनके यहाँ खाना भी गवारा नहीं ।

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