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ग़ज़ल-नूर -आँख से उतरा नहीं है

२१२२/२१२२ 
आँख से उतरा नहीं है 
बस!! कोई रिश्ता नहीं है. 

हम पुराने हो चले हैं 

आईना रूठा नहीं है.

मुस्कुराहट भी पहन ली  

ग़म मगर छुपता नहीं है.

साथ ख़ुशबू है तुम्हारी 

ये सफ़र तन्हा नहीं है.

तुम बदल जितना गए हो 

वक़्त भी बदला नहीं है.

टूट जाता है वो अक्सर 

जो कभी झुकता नहीं है.

है बदन पर धूल लिपटी 

दिल मगर मैला नहीं है.

वक़्त ने ठुकरा दिया बस 

वरना मुझ में क्या नहीं है.  
.
निलेश "नूर"
मौलिक/अप्रकाशित 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 17, 2015 at 8:32pm

धन्यवाद आ. गुमनाम जी 

Comment by gumnaam pithoragarhi on April 17, 2015 at 8:17pm
वाह बहुत खूब सर जी इस खूब सूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई
.............................
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 17, 2015 at 7:28pm

शुक्रिया आ. गिरिराज जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 17, 2015 at 7:05pm

आदरणीय नीलेश भाई ,   क्या खूब गज़ल कही है , वाह !! लाजवाब , दिली मुबारक बाद कुबूल करें ॥

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 17, 2015 at 2:24pm

शुक्रिया आ. डॉ साहब 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 17, 2015 at 2:23pm

शुक्रिया आ. समर कबीर साहब. दरअसल छुट्टी के दौरान घर आया हुआ था इसलिए सारा समय परिवार को दे दिया. अब फिर काम पर लौटा हूँ तो मंच पर भी नियमित हाज़री बजाने का प्रयास करूँगा.
शुक्रिया फिर एक बार 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 17, 2015 at 2:22pm

शुक्रिया आ. विजय शंकर जी 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 17, 2015 at 12:11pm

नूर भाई

मकते की दुहाई . गजब - गजब . सादर .

Comment by Samar kabeer on April 17, 2015 at 10:48am
जनाब निलेश "नूर" जी,आदाब,वाह वाह वाह,क्या ख़ूबसूरत ग़ज़ल से नवाज़ा है आपने मंच को,हर शैर में एक दास्ताँ छुपी है,लेकिन भाई आपकी ग़ज़लें सुनने को तरस जाते हैं,मंच से इतनी देर तक ग़ायब न रहा करें,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |
Comment by Dr. Vijai Shanker on April 17, 2015 at 1:41am
तुम बदल जितना गए हो
वक़्त भी बदला नहीं है.
वक़्त ने ठुकरा दिया बस
वरना मुझ में क्या नहीं है.
बहुत खूब , आदरणीय नीलेश शेवगांवकर जी, बहुत बहुत बधाई , इस उम्दा ग़ज़ल के लिए , सादर।

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