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१२२२/ १२२२ / १२२ 

न जानें क्या से क्या जोड़ा करेंगे
तुम्हारे ग़म में दिल थोडा करेंगे.
.
तुम्हारे साथ हम पीते रहे हैं  
तुम्हारी नाम की छोड़ा करेंगे.
.
तुम्हारी आँख का हर एक आँसू
हम अपनी आँख में मोड़ा करेंगे.
.
घरौंदे रेत के क्यूँ ग़ैर तोड़े
बनाएंगे, हमीं तोडा करेंगे.  
.
नपेंगे आज सारे चाँद तारे
हम अपनी फ़िक्र को घोडा करेंगे.
.
ख़ुदा को हिचकियाँ लगने लगेंगी
उसे आहों से झिंझोड़ा करेंगे.   
.
निलेश 'नूर' 
मौलिक / अप्रकाशित 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 20, 2015 at 3:13pm

आ. बहुत सुन्दर गज़ल कही ॥ आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 19, 2015 at 11:51am

शुक्रिया आ. सौरभ सर. तुम्हारे ही है. शायद टाइपिंग में गलती रह गयी  

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 19, 2015 at 11:50am

शुक्रिया आ. समर साहब 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 19, 2015 at 11:01am

’ओड़ा’ के काफ़िया को क्या बढिया निभा ले गये !

बधाई आदरणीय.

तुम्हारी नाम की छोड़ा करेंगे. या तुम्हारे नाम की छोड़ा करेंगे ? .. सही क्या होगा ? 

 

Comment by Samar kabeer on April 19, 2015 at 10:34am
जनाब निलेश नूर जी,आदाब,इस ज़मीन में अच्छे अशआर निकालना बहुत कठिन है,आपकी पिछली ग़ज़लों के मुक़ाबले यह ग़ज़ल कुछ कमज़ोर नज़र आई,फिर भी कुछ शैर अच्छे हैं,बधाई स्वीकार करें |
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 19, 2015 at 9:28am

नपेंगे आज सारे चाँद तारे
हम अपनी फ़िक्र को घोडा करेंगे.  वाह! क्या बात है सर

सुन्दर गज़ल पर बधाई आदरणीय!

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 18, 2015 at 9:40pm

शुक्रिया आ. जितेन्द्र जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 18, 2015 at 9:39pm

शुक्रियाआ. उमेश जी 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 18, 2015 at 8:58pm

वाह! बहुत ही खूबसूरत गजल कही है आदरणीय नीलेश जी. दिली बधाई स्वीकारें 

Comment by umesh katara on April 18, 2015 at 7:28pm

बाह बेहतरीन गजल है सर वाह

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