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काला पानी (लघुकथा)

"अरे राधेलाल,फिर चाय का ठेला! तुम तो अपना धंधा समेटकर अपने बेटे और बहू के घर चले गए थे।"
"अरे सिन्हा साब!वो घर नही,काला पानी है काला पानी!सभी अपने ज़िन्दगी में इतने व्यस्त हैं कि न कोई मुझसे बात करता और न कोई मेरी बात सुनता।बस सारा दिन या तो टी वी देखो या फिर छत और दीवारों को ताको।भाग आया।यहाँ आपलोगों के साथ बतियाते और चाय पिलाते बड़ा अच्छा समय बीत जाता है।अरे,आप किस सोच में पड़ गए?"
"सोच रहा हूँ कि मै तो तुम्हारी तरह चाय का ठेला भी नही लगा सकता।बेटा बहुत बड़ा अफ़सर जो ठहरा।"फीकी हँसी के साथ चाय का प्याला होठों से लगा लिया।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Mala Jha on May 13, 2015 at 1:55pm
आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी साभार धन्यवाद।
Comment by kanta roy on May 10, 2015 at 11:12am
बहुत खूब आदरणीया माला जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 7, 2015 at 1:26pm

दिल में  टीस छोड़ती एक सफल लघु कथा ...हार्दिक बधाई माला झा जी .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 1, 2015 at 1:53pm

अंतिम पंक्ति और समय चाहती है. कथा की धार और प्रखर हो जाती.

शुभेच्छाएँ ..

Comment by Vivek Jha on May 1, 2015 at 12:54pm

कहानी में व्यंजित भाव वर्तमान समाज के  वंचित वृद्धों का आईना है, बहुत ही चुस्त है, तत्पश्चात मेरी व्यक्तिगत राय है कि यदि चाय का ठेला लगाने वाले राधेलाल की भाषा में कुछ गवईपण कुछ ठेठपन होता तो लघुकथा और भी तीक्ष्ण और धारदार होती | 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on April 28, 2015 at 11:32am

सत्य कथन!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 28, 2015 at 9:49am

अपना जीवन स्वतंत्रता से जीने वाली, आज की अवसरवादी पीढ़ी ने बुजुर्गों का यही हाल कर रखा है. सुंदर प्रस्तुति आदरणीया माला जी.

Comment by aman kumar on April 28, 2015 at 8:35am

वर्तमान समाज की विडमबना .........

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 27, 2015 at 8:09pm

आखरी वाक्य की आवश्यकता  लघु कथा के लिहाज से नहीं थी . पर  कथा बहुत अच्छी है . 

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 27, 2015 at 6:02pm
वानप्रस्थ , अपना अपना , बधाई।

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