कोई झील बे-चैन सी,
कोई प्यास बे-खुद सी,
कोई शोखी बे-नज़ीर सी,
तेरी आँखों के और कितने नाम है.....
कोई ख़्याल बे-शक्ल सा,
कोई सितारा बे-नूर सा,
कोई बादल बे-आब सा,
मेरे अरमानों के और कितने नाम है.....
कोई रात बे-पर्दा सी,
कोई बिजली बे-तरतीब सी,
कोई अंगडाई बे-करार सी,
तेरी अदाओं के और कितने नाम है ....
कोई पत्थर बे-दाम सा,
कोई झरना बे-ताब सा,
कोई मुसाफिर बे-घर सा,
मेरी मोहब्बत के और कितने नाम है......
कोई दौलत बे-हिसाब सी,
कोई शोहरत बे-शुमार सी,
कोई गाडी बे-लगाम सी,
तेरी यादों के और कितने नाम है......
कोई आंसू बे-सबब सा,
कोई रिश्ता बे-मेल सा,
कोई इलज़ाम बे-वहज सा,
मेरी वफ़ा के और कितने नाम है......
और कितने नाम हैं .........
.
नूर
मौलिक / अप्रकाशित
Comment
क्या कहने आदरणीय निलेश जी, कई कई बाते सलीके से साझा हुई है अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें.
आदरणीय नीलेश जी एक विचार आया है कि अगर रचना की शुरुआत किसी भूमिका से हो यथा -
और कितने नाम है
तेरे मेरे मरासिम के
कोई झील बे-चैन सी,
कोई प्यास बे-खुद सी,
कोई शोखी बे-नज़ीर सी,
तेरी आँखों के और कितने नाम है.....
कहीं से शुरुआत लगे तो नज्म मुक्कमल लगेगी. ऐसा मुझे लग रहा है. विचार न जमे तो ऐसे भी बहुत उम्दा है.
शुक्रिया आ. श्री सुनील जी
शुक्रिया आ. सुशिल जी
कोई रात बे-पर्दा सी,
कोई बिजली बे-तरतीब सी,
कोई अंगडाई बे-करार सी,
तेरी अदाओं के और कितने नाम है ....
गज़ब की प्रभावी प्रस्तुति … गज़ब का शाब्दिक तालमेल .... बहुत ही दिलकश प्रस्तुति बन पड़ी है … पाठक अंत तक मंत्रमुग्ध हो कर रचना का रसस्वादन करता है … हार्दिक बधाई कबूल फरमाएं आदरणीय।
खूब बतियाइये आप लोग..
:-))
आ. मिथिलेश जी ..प्रतिक्रिया का शुक्रिया ..
हाँ और क्या... आप हम जैसे संवेदनशील लोग फिट कहाँ बैठते हैं :)))
शुक्रिया आ. सौरभ सर ...
ऐसे ही प्रश्नों का जवाब खोजते खोजते अच्छा भला इंसान शायरी करने लगता है :))
सादर
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