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बुला लेते(कविता)

नूरे-नजर से देखिये,फिर नूर आ जाता,
तबीयत से बुला लें,रब हुजूर आ जाता।
रहे आपको बुलाते अरसा गुजर गया,
आप जो बुलाते, बंदा जरूर आ जाता।
ढका रहा चाँद घटाओं में,हटाते गेशू,
पल भर ही,नजर भरपूर आ जाता।
कैसी झिझक यह? देख लेते एक बार,
आपकी नजर बंदा कम दूर आ जाता।
चिलमन-चादर-ए-बेरुखी,ख्वाहिशे-जहाँ,
हटाते,फिजा-ए-प्यार का शुरुर आ जाता।
'मौलिक व अप्रकाशित'@मनन

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Comment by Manan Kumar singh on May 24, 2015 at 7:34pm

मित्रो, डेस्कटॉप से दूर रहने से आपसे संपर्क मे विलंब हुआ जो खेदजन्य है। अब मोबाइल में काम हो जाता है, पर टिप्पणी वगैरह इसमें नहीं कर पाता हूँ। 

Comment by Manan Kumar singh on May 24, 2015 at 7:32pm

आदरणीय समरजी,श्यामजी,गोपाल भाई,डॉ प्राची जी, जितेंद्र जी !आभार आपका। 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 20, 2015 at 12:24am

बहुत सुंदर, आदरणीय मनन जी. हार्दिक बधाई स्वीकारें


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 19, 2015 at 9:24pm

हृदय की पुकार पर दरस/उपस्थिति की आश्वस्ति देती सुन्दर अभिव्यक्ति आ० मनन कुमार सिंह जी 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 19, 2015 at 4:27pm

मनन जी

 बढ़िया  लिखा आपने .

Comment by Shyam Narain Verma on May 19, 2015 at 10:47am

शानदार रचना पर हार्दिक बधाई

Comment by Samar kabeer on May 19, 2015 at 10:14am
जनाब मनन कुमार सिंह जी,आदाब,सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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