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सलामती की दुआ(कविता)

वे मेरी सलामती की दुआ करते हैं
दूर रहते भी मेरे पास हुआ करते हैं
आ जाते पास मेरे खिड़की के रस्ते
बातें शुरू हों कि खत्म मुआ करते हैं
कुछ तो सिफत है मेरे दोस्त में कि
कुछ कहते मेरा दिल छुआ करते हैं
गोधूलि की ललाई रौनक ए सहर हो
अब हम हयात- ए -जुआ करते हैं।
बड़े बेदम हो जाते इस आवाजाही से,
गुल-ए-ख्वाब जब जुदा हुआ करते हैं।
'मौलिक व अप्रकाशित'@मनन

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Comment by Manan Kumar singh on May 24, 2015 at 7:30pm

आदरणीय श्याम जी, समर जी, सुशील जी !आभार आपका। 

Comment by Sushil Sarna on May 21, 2015 at 7:43pm

बहुत सुंदर प्रस्तुति  … हार्दिक बधाई आदरणीय 

Comment by Samar kabeer on May 20, 2015 at 10:23am
जनाब मनन कुमार सिंह जी ,आदाब,आपकी ग़ज़ल नुमा कविता अच्छी लगी ,बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Shyam Narain Verma on May 20, 2015 at 10:11am
इस सुंदर प्रस्तुति के लिए तहे दिल बधाई सादर

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