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जीवन के जिस राग  का अनुभव में था ताप l  

बिन उसके जीवन वृथा, धन-वैभव या शाप ll 

 

भय वश मैं झिझका रहा प्रेम न फटका पास l 

गहरी नदिया पास थी अमिट और भी प्यास ll

 

मैं क्या जानूं उसे जो,   छिप कर करता वार  l

जीवन-रस अमृत सही,  छलक रहा हो सार  ll

 

कुछ तो फूटा है यहाँ, फैला है अनुराग l

बिन बदली भीगा बदन, ठंढी-ठंढी आग ll

 

यह सुगंध अनुराग की बढ़ा रही है चाह l                                                                                         

कैसे पहुचूँ आप तक दिखे न कोई राह ll  

 

बस इतना ही जानता, मैं हूँ पूर्ण अपूर्ण l 

बिन मेरे तेरी  मगर नहीं पूर्णता पूर्ण ll 

तेरे रस से पा रहा था अब तक कुछ मान l
टूटे मन के सब  भरम  छूटी झूंठी शान ll
डूब-डूब कर पंक में खूब हुआ हूँ म्लान l
योग क्षेम वाहक  मेरा कब रखोगे ध्यान ll

  

यह मेरी अप्रकाशित और मौलिक रचना है l

डॉ बृजेश कुमार त्रिपाठी

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Comment

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Comment by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on July 10, 2015 at 10:39pm

भाई गणेश जी

                   सादर वंदन

क्षमा चाहता हूँ ..हूँ तो आप के करीब ही लेकिन कुछ तो व्यस्तता रही नौकरी की और कुछ लिखने का उपयुक्त भाव ही नहीं बन पाया ...कई बार साईट पर बैठा लेकिन किसी अनपढ़ की तरह ...समझ ही नहीं पा रहा था क्या हो गया है ...कभी कभी आप लोगों  का साहित्य सृजन मन में प्रेरणा उत्पन्न करता था लेकिन अल्प काल के लिए....दिसम्बर १५  में सेवा निवृत्त हो रहा हूँ ..आशा है फिर नियम से सत्संग होगा  l


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 4, 2015 at 4:45pm

आदरणीय डॉ साहब, आप द्वारा प्रस्तुत दोहे अच्छे हैं, एक दो जगह कुछ कमी है जिसपर आदरणीय गोपाल नारायण जी बहुमूल्य सुझाव दिए हैं ...लेकिन इन सबसे पहले ...........आप हैं कहाँ आदरणीय ?

Comment by babita choubey shakti on May 31, 2015 at 12:11pm
आदरणीय जी अति सुंदर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 28, 2015 at 10:19am

आदरणीय ब्रिजेश कुमार त्रिपाठीजी, आपको एक अरसे बाद इस मंच पर पुनः देखना अतीव प्रसन्नता का कारण हुआ है.
सहभागिता के लिए हार्दिक धन्यवाद. आदरणीय गोपाल नारायनजी के कहे का संज्ञान लें.
सादर

Comment by narendrasinh chauhan on May 26, 2015 at 12:03pm

बस इतना ही जानता, मैं हूँ पूर्ण अपूर्ण l 

बिन मेरे तेरी  मगर नहीं पूर्णता पूर्ण!! बहुत खूब सुन्दर रचना

Comment by Samar kabeer on May 25, 2015 at 3:41pm
जनाब डॉ.ब्रिजेश कुमार त्रिपाठी जी,आदाब,सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।
Comment by मनोज अहसास on May 24, 2015 at 3:43pm
बहुत खूब सर
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 24, 2015 at 11:38am

आ ० बृजेश जी

बहुत सुन्दर दोहे रचे आपने . बस एक जगह चूक हुयी ----------मैं  क्या जानूं  उसे  जो -----इस विषम चरण के अंत में  यगण  क्यों ? सगठन  4+4+३+2  तो सही है पर  सनियम यहाँ त्रिकल  १२ नहीं २१ ही मान्य  है i वर्तनी  में  ठंडी-ठंडी को ठंढी- ठंढी कर लें  तथा धिखें को दिखे ' सादर .

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