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जरुरी है क्या कि प्रेम हो तो विवाह भी हो?
गर कहीं हो जाये तो आगे निर्वाह भी हो?
आज का प्रेम है,पुरखों की बात पुरानी हुई,
जरुरी है क्या सबके मन में उछाह भी हो?
साथ का सिलसिला चलता रहेगा आगे भी,
जरुरी है क्या तेरे लिए मन में कराह भी हो?
जरूरतों का कुछ भी तो नाम होना चाहिए,
ढेर-सारी जरूरतों के आगे तो विवाह भीहो!
प्रेम हो,फिर विवाह,चाहे विवाह हो तब प्रेम,
प्रेमपूर्ण हो,फिर वही विवाह तो विवाहभी हो!
'मौलिक व अप्रकाशित'@मनन

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Comment by Manan Kumar singh on June 4, 2015 at 6:14pm

जी मिश्राजी, विवाह शब्द के साथ न्याय करने का यथासंभव प्रयास किया गया है यहाँ, सादर। 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 27, 2015 at 12:30pm

सुन्दर प्रस्तुति पर बधाई आ०  मनन जी!

Comment by Manan Kumar singh on May 26, 2015 at 10:32pm

चूकवश टिप्पणी का कुछ अंश विलोप हो गया। हाँ, इतना कह सकता हूँ कि कविता की अंतिम दो पंक्तियाँ भाव स्पष्ट कर देती होंगी शायद,सादर। 

Comment by Manan Kumar singh on May 25, 2015 at 8:11pm
आदरणीय मित्रों की टिप्पणियाँ वस्तुतः प्रेरित करनेवाली हैं।बहुत ही सम्यक और घनिष्ठता पूर्ण स्नेहिल व्यवहार देने के लिए आप सबका बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूँ।अब रही बात उक्त कविता में सँजोये भाव की तो इसकी बावत मैं इतना ही कह सकता हूँ कि यह रचना प्रेम और विवाह के तत्वों को ध्यान में रखकर आविर्भूत हुई है; हाँ स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध में यहाँ विवाह की अवधारणा को चिन्हित करते हुए इतना ही कहने का प्रयास हुआ है कि विवाह यदि प्रेम समर्थित हो तो एक आदर्श है,सम्बन्ध की मजबूती है।बहुत-से उदाहरण हो सकते हैं जहाँ प्रेम होते हुए भी विवाह का रिवाज पूरा नहीं हो पता है ,प्रेम चलते रहता है।अब उस स्थिति पर गौर करते हैं जहाँ विवाह का रिवाज तो पूरा हो चुका होता है,चल भी रहा होता है,पर वही निभते हुए बस.........
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 25, 2015 at 4:18pm

मनन जी

अधिक लिखने से बेह्तर है  एक ही रचना पर कंसंट्रेट करें . आप अपने को नहीं दूसरो को प्रभावित करने के लिए लिख रहे है यह ध्यान में रखें  .  कभी आप बहुत अच्छा लिख जाते है पर अगली पंक्ति में बरकरार  नहीं रह पाते i इसका एक ही कारण है समय कम देना . आपकी रचनाएं  समय और चिंतन मांगती हैं . सादर .

Comment by Samar kabeer on May 25, 2015 at 3:09pm
जनाब मनन कुमार सिंह जी,आदाब,सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।

"अलग रंग है आपकी लेखनी का
मैं सब से यही तो कहा चाहता हूँ"
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 25, 2015 at 11:54am

इस रचना क्या औचत्य है भाई  मनन सिंह जी | प्रेम तो सभी करते है पशु पक्षी सन्यासी ब्रह्मचारी | विवाहित बंधन एक सामाजिक रिवाज या  संस्कार है जो भारत  ही नहीं सम्पूर्ण दुनिया में अपने अपने रीति रिवाज और  धार्मिक आस्था पर आधारित है | अगर ब्रह्मचारी रहना है तो विवाह का कोई बंधन नहीं है | विवाह करना, न करना, निर्वाह करना न करना ये सब मनुष्य के निजी विचारों पर निर्भर करते है | एक सामाजिक प्राणी विवाह को पवित्र बंधन मानता है तो निर्वाह करना अनिवार्य समझता है |

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