For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

जाम छूते मेरे हंगामा क्यूँ

२१२२  १२१२   २२

हुस्न वाले सलाम करते हैं 

क़त्ल यूं ही तमाम करते हैं 

वो मसीहा चमन को लूट कहे 

काम ये लोग आम करते हैं 

आग दिल में लगाते गुल दिन में 

रात तन्हाई नाम करते हैं 

काम मेरा हुनर जो कर न सका 

मैकदे के ये जाम करते हैं 

जाम छूते मेरे हंगामा क्यूँ 

शेख तो  सुब्हो-शाम करते हैं 

कैसे रिश्तों में वो तपिश मिलती 

रिश्ते जब तय पयाम करते हैं 

उनको बुलबुल तभी ये भाती है 

जब ये उसको गुलाम करते हैं 

दिल में खंजर छुपा के बैठे पर 

मिलते ही राम राम करते हैं 

सोना चढ़ कर के सर पे बोल रहा 

काम ये उसके दाम करते हैं 

हिन्दू मुस्लिम के बीच खाई को 

गहरा पंडित इमाम करते हैं

मौलिक व अप्रकाशित 

Views: 850

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 1, 2015 at 10:04pm

अच्छी ग़ज़ल कही है आ० आसुतोष जी ,आ० वीनस जी की इस्स्लाह काबिले गौर है ,आपको हार्दिक बधाई 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 1, 2015 at 1:17pm

आदरणीय गोपाल सर ..आपका स्नेह और आशीर्वाद मुझे सदैव मिलता रहा है ..रचना पर आपकी उत्साहित करती प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल धन्यवाद सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 1, 2015 at 1:16pm

आदरणीय वीनस जी ..रचना पर आपका सूक्ष्म विबेचन के साथ बृहत् मार्गदर्शन मिला ..आपका बहुमूल्य समय मुझे मिलता है तो मुझे बेहद खुसी होती है ..मैं रचना फिर से प्रयास करके सुधार करने की कोशिस करूंगा ..आपका मार्गदर्शन यूं ही मिलता रहे और मुझे अपनी कमियों की जानकारी मिलती रहे तो इससे मेरे लेखन में सुधार की गुंजाईश बची रहेगी ..एक बार फिर से मशविरे के लिए ह्रदय से धन्यवाद देते हुए सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 1, 2015 at 11:32am

आशुतोष जी

आपकी रचना अच्छे लगी  .

काम मेरा हुनर जो कर न सका 

मैकदे के ये जाम करते हैं ............... मुझे यह शेर भी अच्छा  लगा  . वीनस भाई बड़े जानकार है  मगर कभी2  हुनर नहीं हिकमत से भी काम चलता है इस नजरिये से मुझे आपका  शेर अच्छा ल गा .

Comment by वीनस केसरी on May 31, 2015 at 12:17pm

वो मसीहा चमन को लूट कहे 

काम ये लोग आम करते हैं ................. लोग ये काम कर लीजिये


आग दिल में लगाते गुल दिन में 

रात तन्हाई नाम करते हैं ................सानी अस्पष्ट है

काम मेरा हुनर जो कर न सका 

मैकदे के ये जाम करते हैं ...............हुनर होता ही है काम करने के लिए ,,, नहीं तो आपने पास वो हुनर ही नहीं है, आपने पास हुनर भी है, और आप काम भी नहीं कर पा रहे, ऐसा तो नहीं हो सकता  

जाम छूते मेरे हंगामा क्यूँ 

शेख तो  सुब्हो-शाम करते हैं ..........पहला मिसरा बेबहर है .... करते है रदीफ़ चस्पा नहीं हुई है

उनको बुलबुल तभी ये भाती है 

जब ये उसको गुलाम करते हैं ..........दोनों ये शब्द भर्ती का है

दिल में खंजर छुपा के बैठे पर 

मिलते ही राम राम करते हैं .............बैठे पर को हैं बैठे कर लीजिये

सोना चढ़ कर के सर पे बोल रहा 

काम ये उसके दाम करते हैं         चढ़ कर के  = चढ़ क्रिया है कर सहायक क्रिया है के शब्द भर्ती का है

हिन्दू मुस्लिम के बीच खाई को 

गहरा पंडित इमाम करते हैं............ खाई स्त्री लिंग है ... गहरा नहीं गहरी

कुल मिला कर ग़ज़ल में बहुत गुंजाईश है इसे अभी और पकाईये ....

Comment by shree suneel on May 31, 2015 at 2:02am
काम मेरा हुनर जो कर न सका
मैकदे के ये जाम करते हैं '... ख़ूब
आदरणीय आशुतोष जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है. बधाई आपको.
Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 30, 2015 at 12:11pm

आदरणीय मिथिलेश जी ..रचना पर आपकी सकारत्मक प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 30, 2015 at 12:10pm

आदरणीय सौरभ सर ..आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल धन्यवाद सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 29, 2015 at 11:19pm

बढ़िया ग़ज़ल 

आदरणीय आशुतोष जी हार्दिक बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 29, 2015 at 10:30pm

ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीय आशुतोषजी.
शुभ-शुभ

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
" सादर नमस्कार आदरणीय मंच। कुछ अन्य सुझाव: 1- सदस्यों से सहयोग राशि एकत्रित कर ओबीओ की पत्रिका…"
Monday
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अच्छा सुझाव"
Sunday
Gajendra shrotriya replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"प्रतिष्ठित मंच के सभी सम्माननीय सदस्यों को सादर प्रणाम🙏ओ बी ओ परिवार के समक्ष बनी इस विषम परिस्थिति…"
Sunday
Manjeet kaur replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"ओ बी ओ मंच से बहुत कुछ सीखने को मिला इसके बंद होने की खबर दुखद और पीड़ादाई लगी। अजय गुप्ता जी की…"
Saturday
Manjeet kaur commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"धर्मेंद्र कुमार जी आज के मुश्किल दौर में इतना जिगरा ! यथार्थ और सटीक वर्णन के लिए बहुत बहुत बधाई"
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . .मंच

दोहा सप्तक. . . . . मंचअभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।यह जग…See More
Saturday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)

बह्र: 22 22 22 22 22 2 रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिएजंगल का कानून है पहला, चुप रहिएमँहगाई से…See More
Saturday
रोहित डोबरियाल "मल्हार" posted a blog post

दास्तां

एक हो दास्तां तो सुनाएं,लंबी है कहानी, फिर कभी।मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,वो धुंधली सी निशानी,…See More
Saturday
Awanish Dhar Dvivedi posted a blog post

समय

समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।। समय का खेल…See More
Saturday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी"
Saturday
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"उम्मीद है कि इस पटल से संबंधित कोई अच्छी खबर आएगी।"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"इस सुंदर बुनावट और कहन पर आज नजर पड़ी, आदरणीय धर्मेन्द्र जी.  हार्दिक बधाई   "
May 25

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service