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आदरणीय समर कबीर जी
उस्ताद का कमाल बेमिसाल
अब सूरज को दीया भी दिखाते नहीं बनता
वफ़ाओं का अपनी सिला चाहता हूँ
ख़रीदो मुझे मैं बिका चाहता हूँ
इस मतले ने देर चुप रखा है, आदरणीय समर साहब. मुझे भवानी प्रसाद मिश्र की वो कालजयी लम्बी कविता याद आ गयी, जिसमें वे गीत बेचने की बात करते हैं. इस मतले ने आज के संवेदनशील व्यक्तियों की विवशता को कितनी शिद्दत से प्रस्तुत किया है. बधाई, आदरणीय.
मुझे रोक लेती हैं मासूम कलियाँ
मैं ख़ुद से अगर भागना चाहता हूँ
वाह ! किस ऊँचाई तक ले गये आप इस शेर को या किस ऊँचाई पर जाकर यह शेर हुआ है ! सांसारिकता और आध्यात्मिकता के मूल मंतव्यों के बीच के कश्मकश को बहुत ही खूबसूरती से उभारा है आपने.
लगाते हो क्यूँ दैर-ओ-मस्जिद प ताले
ख़ुदा का हर इक घर खुला चाहता हूँ
सही बात ..
आपकी गहनता को सलाम.
लगाते हो क्यूँ दैर-ओ-मस्जिद प ताले
ख़ुदा का हर इक घर खुला चाहता हूँ
छियालीस डिग्री से ऊपर है गर्मी
मैं सावन की ठंडी हवा चाहता हूँ
वाह! आ० समर सर! आपके रंग में रंगी सुन्दर गजल हुयी!हार्दिक बधाई प्रेषित है!
आदाब! खूबसूरत गज़ल पर ढेरों दाद कुबूल करें. आ0 समर भाई जी.
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