For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मां की आखिरी निशानी : लघुकथा : हरि प्रकाश दुबे

“सुनो, याद है न यह जगह!”

“जी याद है ,यहीं तो माँ जी की उनके इच्छा के अनुसार हमने अस्थि विसर्जन किया था !”

“और वो दुर्घटना ?”  

“कैसे भूल सकती हूँ ,आज भी याद है वो दुर्घटना ,हम दोनों तो कार के नीचे दबे हुए थे ,और उसके बाद दोनों के ही एक –एक पैर काटकर किसी तरह डाक्टरों ने हमारी जान बचाई, और मां जी ने अपना सब रुपया –पैसा  और जेवर हमारे इलाज में लगा दिया और उनकी दी हुई ये अंतिम निशानी ,ये बैसाखी हम दोनों का सहारा बन गयीं !”

“तुम्हें पता है मैं बार –बार यहाँ क्यों आता हूँ?”

“नहीं, शायद मां की याद !”

“हाँ ,वो तो है ही पर ,कल रात मां फिर से सपने में आई और उसने कहा “तुम लोग तन से कमजोर भले ही हो पर मन से कमजोर कभी मत बनना !” ....और उन्होंने यह भी कहा की अब 'जयपुर फुट' लगवा लो महावीर विकलांग समिति तुम्हारी सहायता करेगी और तुम दोनों ही अब अतीत को भूल कर जीवन में आगे बढ़ो !”

“और ये बैसाखी...ये हमेशा हमारे साथ रहेगी , मां की आखिरी निशानी !”

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 551

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Shubhranshu Pandey on June 3, 2015 at 1:54pm

आदरणीय हरि प्रकाश जी, 

एक सुन्दर भाव के साथ कथा कही है आपने. 

कथन किनके बीच हो रहा है यह स्पष्ट नहीं है.

कुछ कथन विरोधाभाषी है..//“सुनो, याद है न यह जगह!”// और //“तुम्हें पता है मैं बार –बार यहाँ क्यों आता हूँ?”//  किसी को जगह की याद दिलाना और बार बार उस जगह पर आना और उस जगह जहां मां की अस्थियां विसर्जित की गयीं हों... कन्फ़्युजन पैदा करता है. 

दोनो व्यक्ति कार से दुर्घटनाग्रस्त हुये थे, ये उनके सामाजिक स्तर को बताता है. उन्हें जयपुर फ़ुट के बारे में ना पता हो ये बात कथा के साथ न्याय नहीं कर पा रही है. 

कथा मां के उस बैसाखी के इर्द गिर्द कही गयी है तो उसे अलग भाव के साथ प्रस्तुत किया जा सकता है. 

सुन्दर प्रयास 

सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 2, 2015 at 12:55pm

// 'जयपुर फुट' लगवा लो महावीर विकलांग समिति तुम्हारी सहायता करेगी //

विज्ञापननुमा ऐसी सलाह कमसेकम माँ तो न दे, भले लघुकथा ही क्यों न हो..
सही कहूँ तो एक अच्छे फ्लैश पर सायास प्रयास हुआ प्रतीत हो रहा है, आदरणीय हरि प्रकाश जी.
लेकिन लघुकथा की अंतर्धारा सकारात्मक है. इस हेतु हार्दिक बधाई.
सादर

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 1, 2015 at 12:08pm

आ०  दुबे जी

इस सवाद मैं कथा और पंच दोनों की कमी मुझे लगती है , देखते हैं -सुधीजन क्या कहते हैं !. सादर .

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri posted a blog post

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं

ग़ज़ल 2122  1212  22वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैकितने दुःख दर्द से भरा दिल हैये मेरा क्यूँ हुआ है…See More
Thursday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । हार्दिक आभार आदरणीय । फागोत्सव…"
Wednesday
Nilesh Shevgaonkar and Dayaram Methani are now friends
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212   22 वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है कितने दुःख दर्द से भरा दिल…"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२***पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१। *…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"जय-जय सादर"
Feb 28
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"बेटा,  व्तक्तिवाची नहीं"
Feb 28

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय दयाराम जी, रचनाकार का काम रचनाएँ प्रस्तुत करना है। पाठक-श्रोता-समीक्षक रचनओं में अपनी…"
Feb 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आदरणीय सौरभ पांडेय जी, हर रचना से एक संदेश देने का प्रयास होता है। मुझे आपकी इस लघु कथा से कोई…"
Feb 28

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी जी।  आप उन शब्दों या पंक्तियों को…"
Feb 28
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई। एक दो जगह टंकण त्रुतियाँ रह…"
Feb 28

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service