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पुष्प अधखिले : हरि प्रकाश दुबे

पुष्प अधखिले : हरि प्रकाश दुबे

 

ओस की बूंदों में भीग कर

श्रृंगार नया मन रूप का कर

सूरज की रोशनी में चमकते हुए

खूब इठलाते हैं, पुष्प अधखिले !

 

मंदिर- मज़ार में चढाए जाते है

प्रभु चरणों मै अर्पित हो कर

मन में एक विश्वाश जगा

फूले नहीं समाते हैं, पुष्प अधखिले ! 

 

प्रिय को समर्पण की चाह में

किताबों में रख दिए जाते है

प्रेम के इज़हार और इंतज़ार में

सूख कर भी मुस्कराते हैं, पुष्प अधखिले !

 

तन के श्रृंगार को कभी गेसूओं में

कभी माला बन उर में लटक जाते हैं

कभी प्रिय के होंठों को छू जाते हैं

हर्षित कर जाते हैं , पुष्प अधखिले !

 

जीवन के हर उल्लास पर

हर्ष पर ,विषाद पर

सुख की सेज या मृतशय्या हो  

हरदम साथ निभाते हैं, पुष्प अधखिले !

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित”

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on June 28, 2015 at 4:16am

आदरणीय हरि प्रकाश भाई जी, इस सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई आपको

Comment by shree suneel on June 25, 2015 at 6:23pm
पुष्प अधखिले.... अच्छी रचना आदरणीय हरि प्रकाश जी. हार्दिक बधाई आपको.
Comment by kanta roy on June 25, 2015 at 12:58pm
प्रिय को समर्पण की चाह में
किताबों में रख दिए जाते है
प्रेम के इज़हार और इंतज़ार में
सूख कर भी मुस्कराते हैं, पुष्प अधखिले .....हर शब्द हर पंक्ति में वर्णित अधखिले पुष्प की गरिमा कायम की है आपने आदरणीय हरि प्रकाश दुबे जी ....वाह देखिए तो क्या बात कही कही है यह भी गजब की .......!!!
Comment by Hari Prakash Dubey on June 24, 2015 at 8:53pm

आदरणीय  Dr. Vijai Shanker सर , बहुत बहुत धन्यवाद  आपका  ! सादर  

Comment by विनय कुमार on June 24, 2015 at 8:49pm

// सुख की सेज या मृतशय्या हो
हरदम साथ निभाते हैं, पुष्प अधखिले // , बहुत सुन्दर रचना , बधाई आदरणीय.

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 24, 2015 at 8:41pm
सूख कर भी मुस्कराते हैं, पुष्प अधखिले !
बहुत खूब , आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी, बधाई , सादर।
Comment by Hari Prakash Dubey on June 24, 2015 at 8:06pm

 आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर  अभी ठीक  करता हूँ , आभार  आपका  ! सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 24, 2015 at 7:57pm

मित्र 'शृंगार'  लिखें . खिले पुष्प की चर्चा भी हो . सादर .  

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