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कथा पर प्रतिक्रिया वयकत करने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय रीता गुप्ता जी.
"लेकिन आज मैं, कल तुम और परसो फिर कोई और। इस तरह एक मेरे आंगन से एक नई शुरूआत तो हो सकती है ना।"
"तो अब देर किस बात की है प्रधानजी। शुभ मूहर्त निकला जा रहा है आइये करते है नयी शुरूआत।"
सच में शुरुवात कहीं से करनी पड़ेगी |
सुंदर संदेश और प्रेरित करती कथा पर बधाई
बेहद शिक्षाप्रद प्रस्तुति ,आज की समय की मांग .वरना कल बेटी ही नहीं होगी तो कैसा शादी और कैसा समाज .
सन्देश सही है .. सार्थक है
कथा साहित्य के हिसाब से कहानी में और कसाव आ सकता था .. चर्चा को इतना लंबा खींचने की जरुरत नहीं थी.. आठवे फेरे की जगह आठवां वचन ज्यादा सही रहता ..
मैं खुद कहानी लेखक नहीं हूँ लेकिन एक पाठक हूँ और एक तीसरे इंसान की दृष्टि से अपना ओपिनियन दे रही हूँ ,, अन्यथा न लें
वीरेन्द्र जी
बहुत अच्छा विषय i इस पर एक अच्छी बड़ी तर्कपूर्ण कहानी भी लिखें --आठवां बचन . सादर .
बहुत सुंदर सन्देश के लिये बधाई आदरणीय VIRENDER VEER MEHTA जी
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