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आठवां फेरा - कथा

"सातवां फेरा सम्पन्न हुआ, माता पिता वर-वधू को को आशीर्वाद देने के लिये आगे आये।" पंडितजी की आवाज पर बधाई गान के साथ साथ लोग भी बधाई के लिये अग्रसर होने लगे।
"नही पंडितजी। अभी एक फेरा बाकी है, आठवां फेरा।" प्रधानजी की आवाज ने सब के चेहरे प्रश्नवाचक बना दिये लेकिन प्रश्न करने की चेष्टा कोई नही कर पाया कयोंकि कस्बे के सम्मानित प्रधानजी का अनादर करने की तो कोई सोच भी नही सकता था। कुछ देर के मौन के बाद आखिर पड़ितजी ने ही प्रश्न किया। "ये क्या कह रहे है आप? सभी जानते है कि हमारे शास्त्ररो मे भी सात फेरो का ही प्रावधान है।"
"जी पंडितजी। मैं भी ये भली भांति जानता हूँ लेकिन क्षमा चाहूँगा।" प्रधान जी ने विश्वासी आवाज में अपनी बात कहनी शुरू की। "शास्त्ररो ने मानव को नही गढा है बल्कि शास्त्र ही मानव द्वारा रचे गये है और समय समय पर इन्हे कुछ बदला भी जा सकता है। सही कहा ना मैंने बेटा।" अपनी बात पूरी करते करते प्रधान जी अपने बेटे यानि 'वर' की ओर देखने लगे।
"जी पिताजी!" क्षण भर के लिये बेटे की नजरें पिता पर टिकी और फिर सभी को एक नज़र देखते हुये कहने लगा। "आज हमारे समाज में भ्रूण हत्या एक गम्भीर समस्या बनती जा रही है विशेषतः कन्या को तो अक्सर आने से पहले ही जीवन-मुक्त कर दिया जाता है और इस घोर परिस्थिति में यदि कोई परिवर्तन लाने के लिये पहल कर सकता है तो वह है युवा वर्ग यानि "हम"! और आज मेरे आदरणीय पिताजी इस विवाह समारोह में मुझसे यही पहल करवाना चाहते है।"
पंडाल में उपस्थित सभी लोगो के चेहरे पर असमंजस की स्थिति देख प्रधान जी ने बात को स्पष्ट किया।
"यहाँ सभी उपस्थित परिचितो और अथितिगणो! देखिये, मैं चाहता हूँ कि मेरा बेटा और उसकी होने वाली पत्नि, आज सात फेरो के सातो वचनो के साथ एक और वचन, अपने आंगन में भ्रूण हत्या के घोर अपराध को न करने का वचन ले। बस यही है इनका आठवां फेरा।"
"लेकिन महोदय अतीत में ऐसा कभी नही हुआ।"
"देवताओ के विवाह, यहाँ तक कि प्रभु राम का विवाह भी सात फेरो से ही सम्पन्न हुआ।" कुछ असहमति के स्वर मंडप में उभरे।
"लेकिन चाचा उस युग में 'देवी' को आने से पहले ही जीवन मुक्त भी नही किया जाता था" भरे पडांल में दूल्हन की आत्मविश्वासी आवाज ने लोगो को एक पल के लिये कुछ न कह पाने की स्थिति मे ला दिया।
"लेकिन प्रधान जी एक आप के ऐसा करने से तो समाज नही बदल रहा ना।" एक शंका भरी आवाज फिर उभर कर आयी।
"जानता हूँ सदियो की परम्परा एक दम से नही टूटेगी।" प्रधानजी मुस्कराकर बोले। "लेकिन आज मैं, कल तुम और परसो फिर कोई और। इस तरह एक मेरे आंगन से एक नई शुरूआत तो हो सकती है ना।"
"तो अब देर किस बात की है प्रधानजी। शुभ मूहर्त निकला जा रहा है आइये करते है नयी शुरूआत।" पडितजी ने सहमति की अलख जगायी और वर-वधु के आठवें फेरे के लिये आगे बढने के साथ ही मंडप में फिर से बधाई गान शुरू हो गया।
'विरेन्दर वीर मेहता' (मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by VIRENDER VEER MEHTA on June 10, 2015 at 10:18am

कथा पर प्रतिक्रिया वयकत करने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय रीता गुप्ता जी.

Comment by somesh kumar on June 9, 2015 at 11:17pm

"लेकिन आज मैं, कल तुम और परसो फिर कोई और। इस तरह एक मेरे आंगन से एक नई शुरूआत तो हो सकती है ना।"
"तो अब देर किस बात की है प्रधानजी। शुभ मूहर्त निकला जा रहा है आइये करते है नयी शुरूआत।"

सच में शुरुवात कहीं से करनी पड़ेगी |

सुंदर संदेश और प्रेरित करती कथा पर बधाई

Comment by Rita Gupta on June 9, 2015 at 9:23pm

बेहद  शिक्षाप्रद प्रस्तुति ,आज की समय की मांग .वरना कल बेटी ही नहीं होगी  तो  कैसा शादी और कैसा समाज .

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on June 9, 2015 at 7:50pm
आदरणीया निधी अग्रवालजी कथा पर आपके आगमन और विचारो के लिये हार्दिक आभार।
दरअसल मैंने इस कथा में कल्पना के स्थान पर वास्तविकता को स्थान दिया है इसलिये शायद इसको मैने यथार्थवादी ही रखा।
Comment by VIRENDER VEER MEHTA on June 9, 2015 at 7:48pm
आदरणीय डा गोपाल नारायण सर जी हौसला अफजाई के लिये आपका तहे दिल से आभार।
आप की कथा को तार्किक आधार पर विस्तार से लिखने की राय भी अति उत्तम है । सादर।
Comment by Nidhi Agrawal on June 9, 2015 at 3:50pm

सन्देश सही है .. सार्थक है

कथा साहित्य के हिसाब से कहानी में और कसाव आ सकता था .. चर्चा को इतना लंबा खींचने की जरुरत नहीं थी.. आठवे फेरे की जगह आठवां वचन ज्यादा सही रहता .. 

मैं खुद कहानी लेखक नहीं हूँ लेकिन एक पाठक हूँ और एक तीसरे इंसान की दृष्टि से अपना ओपिनियन दे रही हूँ ,, अन्यथा न लें 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 9, 2015 at 11:29am

वीरेन्द्र  जी

बहुत अच्छा  विषय i   इस पर एक अच्छी  बड़ी  तर्कपूर्ण कहानी भी लिखें  --आठवां बचन .  सादर .

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on June 9, 2015 at 10:45am
आदरणीय सुनीलजी/ सेठी जी / विनय कुमार जी / जितेंदर पस्टारिया जी
कथा पर आप सब की सकारत्मक प्रतिक्रिया और मोजूदगी के लिये तहे दिल से आभार।
एक बात आप से अवश्य साझा करना चाहूँगा कि ये कथा सिर्फ कल्पना या विचार नही है। ये एक प्रयास है जो हरियाणा के एक गाँव में शूरू किया गया है और इस के लिये प्रेरणा और प्रयास का काम कर रहे है इडियन रेड क्रास सोसायटी के वर्तमान आदरणीय मुख्य सचिव।
Comment by shree suneel on June 9, 2015 at 9:52am
प्रभावित करती सार्थक, समाज को संदेश देती सुन्दर लघु-कथा के लिए बधाइयाँ आपको आदरणीय.
Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on June 9, 2015 at 7:18am

बहुत सुंदर सन्देश के लिये बधाई आदरणीय VIRENDER VEER MEHTA जी 

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