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स्याह धब्बा

ढलते सूरज-से रिश्ते की बुझती लालिमा

सिकुड़ती सिमटती जा रही

अनकही बातों के अरमानों की

अप्राकृतिक अकुलाहट

अपने ही कानों में भयानक

दुर्घटना-सी

अमावस-सी अँधियारी कसकती रात

डरता है व्याकुल बेसुध मन

कि अब तुम नहीं हो पास

बहता है दुख

बेचैन बदनसीब रिश्ता ...

अब स्याह धब्बे-सा

--------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 855

Comment

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Comment by vijay nikore on June 17, 2015 at 9:58am

आदरणीय सुशील जी, रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार।

Comment by vijay nikore on June 16, 2015 at 8:04pm

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय कृष्णा मिश्र जी।

Comment by विनय कुमार on June 16, 2015 at 2:23pm

बेहतरीन रचना हेतु बधाई स्वीकारें आदरणीय विजय निकोर जी ..

Comment by vijay nikore on June 16, 2015 at 1:23pm

रचना के भाव के अनुमोदन के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय सुशील जी।

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 16, 2015 at 10:40am

सुंदर काव्य जो भावनाओ को अंत:करण तक झकझोरती चली जाती है. दिली बधाई स्वीकारे. आ0 निकोर सर जी.

Comment by vijay nikore on June 16, 2015 at 7:51am

सराहना से मनोबल बढ़ाने के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय विजय शंकर जी।

आपकी काव्यात्मक प्रतिक्रिया बहुत अच्छी लगी।

Comment by kanta roy on June 16, 2015 at 7:25am
बहुत ही शानदार रचना हुई है आपकी आदरणीय विजय निकोरे ॥

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on June 16, 2015 at 3:53am
श्रद्धेय, आपकी रचनाओं पर प्रतिक्रिया दूँ, मैं इस काबिल नहीं. प्रस्तुत रचना की अंतिम तीन पंक्तियों में क्या कुछ नहीं है, बार-बार डूबने को मन करता है भावनाओं की इस सरिता में. नमन.
Comment by Samar kabeer on June 15, 2015 at 2:36pm
जनाब विजय निकोरे जी,आदाब,आपकी कविता बहुत पसंद आई ,दिल को छू लिया इसने ,पंक्ति दर पंक्ति इस रचना पर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।
Comment by Sushil Sarna on June 15, 2015 at 2:03pm

बेचैन बदनसीब रिश्ता ...
अब स्याह धब्बे-सा
वाह आदरणीय निकोर साहिब बहुत ही गहन भावों की प्रस्तुति पेश की आपने … हार्दिक बधाई सर

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