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ग़ज़ल - फिल बदीह -- फिर किसी सलमान को ( गिरिराज भंडारी )

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दें सहारा, लड़खड़ाते आ रहे नादान को

पूछ तो लें बोझ कितना है, भले इंसान को

 

तू समन्दर पास आँखें खोल के रखना नहीं

ठेस लग जाये न तेरे ज्ञान के अभिमान को  

 

ओ मेरे फुटपाथ पे सोये हुये मित्रों,  जगो !

क्यों बुलावा दे रहे हो फिर किसी सलमान को

 

कोशिशें तो खूब की आँसू गिरे, महफिल ने पर

हम ही बो आये वहाँ हर जा किसी मुस्कान को

 

क्यों हरा होता नहीं ये दिल , ख़िज़ाँ हो या बहार

मै कहाँ ले जाऊँ बोलो , इस दिल ए वीरान को

 

छोड़ के मज़हब सभी इंसानियत सिखला कभी 

मै   इशारा  कर  रहा हूँ  मुल्क़ के  दरबान को

 

आप कह के आप ही समझें, तो कहना क्यूँ ? तभी

आग दावत दे रही है उन सभी दीवान को

***********************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

 

 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 5, 2015 at 8:01am

आदरणीय सौरभ भाई , हौसला अफज़ाई का बेहद शुक्रिया ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 5, 2015 at 12:31am

आदरणीय  .. सलमान का काफ़िया निराला है. :-)

उम्दा प्रयास हुआ है. हार्दिक शुभकामनाएँ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 18, 2015 at 2:24pm

आदरणीय वीनस भाई , आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 18, 2015 at 2:23pm

आदरणीय राहुल भाई , आपका बहुत शुक्रिया ॥

Comment by वीनस केसरी on June 18, 2015 at 1:37pm

वाह वा बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है ...

Comment by Rahul Dangi Panchal on June 18, 2015 at 8:08am
बहुत सुन्दर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 17, 2015 at 9:10am

आदरणीय कृष्णा भाई , मन की लहर की बात है , कभी ऐसा रंग भी चढ़ा होता है मन में , स्थायी नही है ये ॥ सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 17, 2015 at 9:08am

आदरणीय समर कबी र भाई , हौसला अफज़ाई का बेहद शुक्रिया ॥

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 17, 2015 at 8:54am

ओ मेरे फुटपाथ पे सोये हुये मित्रों,  जगो !

क्यों बुलावा दे रहे हो फिर किसी सलमान को

आप कह के आप ही समझें, तो कहना क्यूँ ? तभी

आग दावत दे रही है उन सभी दीवान को

 

वाह वाह वाह! आदरणीय आपको इस रंग में पहली बार देखा है!लाजव़ाब!नमन!

Comment by Samar kabeer on June 16, 2015 at 10:36pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी,आदाब,आज कल तो आप कमाल पर कमाल कर रहें है,ये ग़ज़ल भी मुरस्सा है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

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