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ग़ज़ल : रूह भी इन पर्वतों की दूध जैसी है

बह्र : २१२२ २१२२ २१२२ २

 

जिस्म की रंगत भले ही दूध जैसी है

रूह भी इन पर्वतों की दूध जैसी है

 

पर्वतों से मिल यकीं होने लगा मुझको

हर नदी की नौजवानी दूध जैसी है

 

छाछ, मक्खन, घी, दही, रबड़ी छुपे इसमें

पर्वतों की ज़िंदगानी दूध जैसी है

 

सर्दियाँ जब दूध बरसातीं पहाड़ों में

यूँ लगे सारी ही धरती दूध जैसी है

 

तेज़ चलने की बिमारी हो तो मत आना

वक्त लेती है पहाड़ी, दूध जैसी है

------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 8, 2015 at 11:42am
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी,
मैं पिछले दस साल से हिमालय की पहाड़ियों में ही तो रह रहा हूँ :)

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 8, 2015 at 2:17am

कहाँ से हो आये ? हिमालय बसा हुआ है ग़ज़ल में ..
दाद कुबूल कीजिये आदरणीय

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 6, 2015 at 6:05pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय गोपाल नारायण जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 6, 2015 at 6:05pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय जवाहर लाल जी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 2, 2015 at 8:34pm

बहुत उम्दा

अ0 धर्मेन्द्र जी .

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 2, 2015 at 7:37pm

वाह वाह! आपकी अभिव्यक्ति भी दूध जैसी है ..सादर!

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 2, 2015 at 6:14pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय महर्षि जी

Comment by maharshi tripathi on July 2, 2015 at 5:22pm

बहुत खूब !!हर एक शेर लाजवाब है ,,,दिली बधाई आ. धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी |

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 2, 2015 at 3:13pm
शुक्रिया जान गोरखपुरी साहब
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on July 2, 2015 at 2:17pm

वाह आ० धर्मेन्द जी ग्लोबल वार्मिग के खतरे में परबतों और इंसानों पर पर जो खतरे की सुई मडरा रही है उस बाबत पर्वत की महत्ता पर प्रकाश डालती इस गजल की जितनी तारीफ की जाये कम है.. बेहतरीन प्रस्तुति! तहेदिल से दाद प्रेषित है!

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