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गज़ल - फिल बदीह - कभी पत्थर नहीं देता ( गिरिराज भंडारी )

122     122    122    122

जहाँ वाले यूँ तो बताते रहे हैं

हमी अपनी ख़ामी छुपाते रहे हैं

वो अमराई , झूले वो पेड़ों के साये

बहुत देर तक याद आते रहे हैं

यूँ शह्रों की रोटी ने दी ज़िन्दगी है

मगर गाँव हमको लुभाते रहे हैं

क़दम दर क़दम इन थके पाँव को हम

महज़ ख़्वाबे मंज़िल दिखाते रहे हैं

ये बेहूदे पन अहदे नौ के हमेशा

मेरी सोच को बस सताते रहे हैं

ये कैसी मुहब्बत , ये कैसी वफा है

है अंदर नहीं पर जताते रहे हैं

ख़ुदाया तेरे नूर में भीगने, हम

ख़ुदी को हमेशा जलाते रहे हैं

*******************************

मैलिक एवँ अप्रकाशित

Views: 712

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 12, 2015 at 10:00pm

आदरणीय श्री सुनील भाई , हौसला अफज़ाई का बेहद शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 12, 2015 at 9:58pm

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , आपका आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 12, 2015 at 9:58pm

आदार्णीय राहुल भाई आपका बहुत शुक्रिया ।

Comment by shree suneel on July 12, 2015 at 9:53pm
ये बेहूदे पन अहदे नौ के हमेशा
मेरी सोच को बस सताते रहे हैं... ख़ूब.. ख़ूब
वो अमराई , झूले वो पेड़ों के साये
बहुत देर तक याद आते रहे हैं.. क्या बात!
इस ख़ूबसूरत प्रस्तुति पर बधाई आपको आदरणीय.
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 10, 2015 at 8:22pm

आपकी गजल में अकसर  तारीफ़ के अलावे कुछ कहने को नहीं रहता. सादर .

Comment by Rahul Dangi Panchal on July 8, 2015 at 10:54pm
सुन्दर गजल हेतु बधाई स्वीकार करें आदरणीय।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 8, 2015 at 8:11pm

आदरणीय नरेन्द्र भाई , आपका बहुत शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 8, 2015 at 8:11pm

आदरणीय बड़े भाई विजय जी , सराहना के लिये आपका आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 8, 2015 at 8:10pm

आदरणीया निधि जी , हौसला अफज़ाई का  बहुत शुक्रिया ।

Comment by narendrasinh chauhan on July 8, 2015 at 6:35pm

अच्छी गज़ल के लिए बधाई

कृपया ध्यान दे...

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