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दोहा छंद...सब पीतीं मकरंद

मुरली तो मन मोहनी, हरे जगत की पीर.

उसे चुरा कर राधिका, स्वयं हुई गम्भीर.

 

मुरली हर मन मोहती, लिये फकीरी रूप.

सरस कण्ठ निष्काम रख, छुए होंठ बन भूप.

 

बंशी तन में खोट पर, सरगम श्वांस स्वरूप.

अधरों को छूकर कर पगे, नवरस दिव्य अनूप.

 

घायल तन में आह नहि, नहीं तनिक अफसोस.

मुरली सबसे कह रही, पगें राग संतोष.

 

घायल मुरली कोसती, तन-मन बांस कठोर.

पर कान्हा के होंठ लग, गाती भाव विभोर.

 

घायल तन अति शोक मन, मुरली तो निर्जीव.

पर होंठों को चूम कर, तिहुं पुर करे सजीव.

 

दीन हीन घायल मगर, रहे कण्ठ से शाह.

श्वांस श्वांस सुमिरन लगन, बंशी भरे उछाह.

 

गांठ गांठ के बंध से, मुक्त हुआ जब बांस.

मिले घाव पर कण्ठ से, विहसें सरगम श्वांस.

 

बांस कण्ठ की वेदना, मनमोहन की आन.

अपने  होंठों से लगा, उसको  दें सम्मान.

 

होंठों पर मुरली सधी, नयन हुए त्यों बंद.

राधा मीरा गोपियां, सब पीतीं मकरंद.

 

के.पी. सत्यम / मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 14, 2015 at 9:24am

आ० केवल जी

बहुत सुन्दर दोहे. बधायी हो .

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 12, 2015 at 10:58am

सुंदर  और  भाव पूर्ण दोहे रचे है श्री केवल प्रसाद जी | इसके लिए हार्दिक बधाई स्वीकारे | प्रथम दोहे के तृतीय चरण में लय भंग लग रही है | इसे यूँ लिखा जाय (अगर उचित लगे) तो, कृपया देखे -

मुरली तो मन मोहनी, हरे जगत की पीर.  -  मुरली तो मन मोहिनी, हरे जगत की पीर,

राधा  उसको चुरा कर, स्वयं हुई गम्भीर.      उसे चुरा कर राधिका,  हुई स्वयं गंभीर  |

सादर 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 12, 2015 at 10:52am

आदरणीय केवल प्रसाद जी 

सादर अभिवादन 

बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 12, 2015 at 1:19am

आदरणीय केवल प्रसाद जी सुन्दर दोहावली हुई है हार्दिक बधाई 

मुरली की व्यथा कथा बड़े सुन्दर ढंग से शाब्दिक हुई है 

इस पद में टंकण त्रुटी हुई है संभवतः 

//राधा  उसको चुरा कर, स्वयं हुई गम्भीर.//

कृपया ध्यान दे...

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