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ग़ज़ल - हर औरत में सुरसा भी है, और सभी में सीता है ( गिरिराज भंडारी )

22   22   22   22   22   22   22   2   --- 

पेडों पर इल्जाम लगा वो ख़ुद की खातिर जीता है

सोच रहा हूँ मैं सागर क्या अपना पानी पीता है ?

 

झूठा- सच्चा , सही ग़लत ये सब बे पर की बातें हैं

दिखे फाइदा, सच को मोड़ो जिसको जहाँ सुभीता है

 

सभी उँगलियाँ अलग हो गईं अहम बीच में आने से

चुल्लू में कुछ रुका नहीं , जो रीता था, वो रीता है 

 

शब्द कोश बस रट लेने से भाव नहीं पैदा होता

व्यर्थ हाथ में रख लेना क़ुरआन बाइबिल गीता है

 

हर इच्छायें अजगर जैसी लिपटी रहती हैं मन से

और समय का पंजा झपटे जैसे कोई चीता है

 

हर आदम में कृष्ण- कंस है ,  राम जहाँ है रावण भी

हर औरत में सुरसा भी है,  और सभी में सीता है

 

जोंक नुमा किरदार कहूँ या अमर बेल इसको बोलूँ 

जो पर जीवी जिससे लिपटा उसका खूँ ही पीता है

*************************************************

गिरिराज भंडारी

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Comment by दिनेश कुमार on July 20, 2015 at 7:36pm
शुक्रिया आदरणीय।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 20, 2015 at 9:39am

आदरणीय जवाहर भाई , सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 20, 2015 at 9:39am

आदरणीय मिथिलेश भाई , आपका तहे दिल से शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 20, 2015 at 9:38am

आदरणीय आमोद भाई , आपका बहुत शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 20, 2015 at 9:38am

आदरणीय विजय भाई , हौसला अफज़ाई का बहुत शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 20, 2015 at 9:37am

आदरणीय दिनेश भाई ,  सराहना के लिये आपका ऋदय से आभारी हूँ ।

22   22   22   22   22   22   22   2   -- फेलुन  फेलुन ............... फा  , ऐसी बहरों मे  22  को   112  121  या 211 कर लेने की छूट रहती है , बस गेयता बाढित न हो , इसका ध्यान रखा जाता है , अंत मे फा ( 2 ) लेना अच्छा रहता है वैसे  बिना इसके भी गज़लें कही जाती है ,  22   22   22  की कितनी भी संख्या ले सकते हैं ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 20, 2015 at 9:33am

आदरणीय धर्मेन्द्र भाई , सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 20, 2015 at 9:32am

आदरणीय मोहन भाई , हौसला अफज़ाई का बेहद शुक्रिया ।

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 18, 2015 at 9:03am

शीर्षक और सभी शेर ग़जब हैं 

झूठा- सच्चा , सही ग़लत ये सब बे पर की बातें हैं

दिखे फाइदा, सच को मोड़ो जिसको जहाँ सुभीता है... वाह!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 16, 2015 at 11:15pm

आदरणीय गिरिराज सर, बेहतरीन ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाएं 

शब्द कोश बस रट लेने से भाव नहीं पैदा होता

व्यर्थ हाथ में रख लेना क़ुरआन बाइबिल गीता है ... बहुत सही कहा है बढ़िया शेर 

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