“वहीँ होगा तुम्हारा लाड़ला इस वक़्त भी है न ? कितनी बार कहा दोस्ती बराबर वालों से ठीक है सर्वेंट के उस लड़के से उसने क्या समझ के दोस्ती की? कुछ तो कॉमन हो... पर तुम क्यूँ समझाती, खुद भी तो.... छोटे घर की... छोटी सोच ...
जैसे संस्कार हैं वही तो बच्चे को दोगी” व्हीस्की का घूँट गले में उतारते हुए मोहित बोला|
“हाँ पापा है न एक चीज कॉमन !! उसके पापा भी रोज ड्रिक करके इतनी रात गए घर में आते हैं और उसकी मम्मी पर इसी तरह चिल्लाते हैं, मेरी मम्मी की आँखें भी बरसती हैं और उसकी मम्मी की भी” बेटा अचानक अन्दर आते हुए बोला|
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(मौलिक एवं अप्रकाशित)
Comment
आ० ओमप्रकाश जी, लघुकथा के अनुमोदन हेतु दिल से आभार आपका.
आदरणीया राजेश कुमारी जी
सादर अभिवादन
बधाई हो लघु कथा पर
बहुत बढ़िया बात कही , जय हो
आदरणीया राजेश दीदी, बढ़िया और सफल लघुकथा हेतु हार्दिक बधाई निवेदित है.
अच्छी लघुकथा
आदरणीय राजेश जी,बहुत गहरी और संवेदनशील बात कहला दी आपने एक मासूम के मुंह से! अच्छी लघुकथा!हार्दिक बधाई!
“हाँ पापा है न एक चीज कॉमन !! उसके पापा भी रोज ड्रिक करके इतनी रात गए घर में आते हैं और उसकी मम्मी पर इसी तरह चिल्लाते हैं, मेरी मम्मी की आँखें भी बरसती हैं और उसकी मम्मी की भी” बेटा अचानक अन्दर आते हुए बोला|
जोरदार पञ्च लाइन . बधाई .
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