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हरियाली हर ले गई,  सबके मन की पीर 

झूले पड गए वृक्ष  में  झूल रही हैं हीर... 1
 
धरती के फिर वक्ष में  है उमंग का जोर  
अंकुर फूटे कोख से,  ममता भरे हिलोर... 2
 
सावन सा वन है यहाँ    हरित दृश्य चहुँ ओर
दादुर-ध्वनि की ताल में,   नृत्य कर रहे मोर... 3
 
सावन मनभावन तभी   जब प्रीतम हों पास 
निर्झर नयनों में दिखी, पिया मिलन की आस... 4
 
प्रियतम हैं परदेश में, भूल गए घरबार 
रिमझिम सावन की लगे,  अब तीरों के वार...5 
 
बिना बताये आ गए,  प्रीतम घर के द्वार 
बौरन अब क्यों नयन में, हैं असुवन के हार ?...6
 
प्रीतम फिर से जायेंगे,  इस चिंता में रोय 
पिय को पा कर साथ में, पगली सुखी न होय ...7
मौलिक और अप्रकाशित
डॉ.बृजेश
 
 

Views: 558

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Comment by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on July 31, 2015 at 5:53am

shukriya adarneey vamankar ji


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 27, 2015 at 4:04pm

आदरणीय बृजेश जी, इस सुन्दर दोहावली की प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकारें. सादर 

Comment by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on July 26, 2015 at 1:38pm

शुक्रिया भाई समर कबीर जी

धन्यवाद भाई गिरिराज भंडारी जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 26, 2015 at 1:26pm

आदरणीय बृजेश भाई , सुन्दर सावनी दोहों के लिये हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on July 26, 2015 at 10:58am
जनाब ब्रिजेश कुमार जी,आदाब,सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें
Comment by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on July 26, 2015 at 10:40am

धन्यवाद मोहिनी बहन

Comment by mohinichordia on July 26, 2015 at 7:46am

bahut khoobsoorat varnan 

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