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साजन का होने को है दीदार लिखो (सावन ऋतु पर एक हिंदी ग़ज़ल 'राज')

 

धरती का नूतन नखशिख सिंगार लिखो

सावन लाया है  मोती के  हार लिखो

 

दादुर मोर मयूरी का आभार लिखो

नदियों नालों में जल का विस्तार लिखो

 

पत्ता पत्ता डाली डाली झूम रही

बूँदे बूँदे चूम रही हैं प्यार लिखो

 

प्यास बुझाती कुदरत कितने प्यासों की

तिनके तिनके पर उसका उपकार लिखो

 

खेतों खेतों  धान उगाते हैं हाली

भेज रहे बादल जल का उपहार लिखो 

 

सागर नदिया लहरों की रफ़्तार गजब   

नैया बहती जाये  बिन पतवार लिखो

 

आमों की डाली पर तीजो के झूले

आया सावन में फिर ये त्यौहार लिखो

 

कैसे झेले मार कड़कती चपला की  

बूढा बरगद है कितना बीमार लिखो

 

बाहर बदरा नैनों में बरसात हुई

साजन की यादों से हैं बेजार लिखो 

 

राहें तकती हैं कबसे बिरहन अँखियाँ

साजन का होने को है दीदार लिखो

 

पल पल रंग बदलते फिरते बौराये

पागल मेघों का नभ पर अधिकार लिखो

मौलिक एवं अप्रकाशित 

 

 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 3, 2015 at 7:28pm

हर्ष महाजन जी,आपको ये प्रस्तुति अच्छी लगी दिल से आभार प्रेषित करती हूँ | 

Comment by Harash Mahajan on August 3, 2015 at 7:23pm

आदरणीय rajesh kumari जी वाह हर शेर भाव पूर्ण

"कैसे झेले मार कड़कती चपला की  

बूढा बरगद है कितना बीमार लिखो".....ये दिल को छू गया ....दाद ......वसूल पाइयेगा !!

साभार !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 3, 2015 at 7:19pm

आ० सौरभ जी ,ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सराहना पाकर मन खुश हो गया मेरा लिखना सार्थक हुआ दिल से बहुत बहुत आभार आपका .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 3, 2015 at 7:18pm

राहुल दांगी जी ,आपका तहे दिल से शुक्रिया प्रभूत आभार .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 3, 2015 at 7:17pm

मिथिलेश भैया पोस्ट पर देर से आने का खेद है दो दिन से नेट ने परेशान किया हुआ था आज जाकर ठीक हुआ |आपको सावन के लिए लिखी ये ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हो गया दिल से आभारी हूँ |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 2, 2015 at 3:54am

कैसे झेले मार कड़कती चपला की
बूढा बरगद है कितना बीमार लिखो

पल पल रंग बदलते फिरते बौराये
पागल मेघों का नभ पर अधिकार लिखो

इन दो अश’आर के बरअक्स आपकी इस कोमलकान्त भावांजलि के हार्दिक शुभकामनाएँ \अच्छी ग़ज़ल हुई है आदरणीया राजेशजी.

Comment by Rahul Dangi Panchal on August 1, 2015 at 2:45pm
आदरणीया बहुत सुन्दर गजल हुई है बधाइयाँ

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 1, 2015 at 10:41am

मिथिलेश भैया ,ग़ज़ल पर सबसे पहले पाठक टिप्पणीकार के रूप में आपका हार्दिक स्वागत है आपको प्रस्तुति पसंद आई मेरा लिखना सफल हुआ दिल से आभारी हूँ |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 1, 2015 at 2:48am

आदरणीया राजेश दीदी शानदार ग़ज़ल हुई है. शेर दर शेर दाद हाज़िर है.

इन तीन अशआर पर दिल से दाद कुबूल फरमाएं -

कैसे झेले मार कड़कती चपला की  

बूढा बरगद है कितना बीमार लिखो

 

राहें तकती हैं कबसे बिरहन अँखियाँ

साजन का होने को है दीदार लिखो

 

पल पल रंग बदलते फिरते बौराये

पागल मेघों का नभ पर अधिकार लिखो

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