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मोम के पिघलने का
सदियों से रहा है दस्तूर
कोई पत्थर अब पिघला दे
तो कोई बात बने
ऐसा भी नही
कि हर शाम हो हसीन
धूप पर पानी छिड़क
तो कोई बात बने
लड़खड़ाकर मन्दिर का
दिया करता है रोशन
घर के परदे को सिल
तो कोई बात बने

.
मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by S.S Dipu on August 5, 2015 at 8:23pm
Manoj Kumar ahsaas ji शुक्रिया।
Comment by S.S Dipu on August 5, 2015 at 8:21pm
Neeraj Kumar 'neer' ji शुक्रिया।
Comment by S.S Dipu on August 5, 2015 at 8:20pm
Savitamishra jiशुक्रिया।
Comment by S.S Dipu on August 5, 2015 at 8:20pm
Manoj Kumar Singh ji शुक्रिया।
Comment by S.S Dipu on August 5, 2015 at 8:18pm
Jawahar lal singh जी आपका बहुत बहुत धन्यावाद।
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 5, 2015 at 8:14pm

धूप पर पानी छिड़क
तो कोई बात बने... मुझे बहुत अच्छी लगी. बधाई आपको!

Comment by मनोज अहसास on August 5, 2015 at 7:45pm
छोटी है पर सच्ची है सर
बधाई
सादर
Comment by savitamishra on August 5, 2015 at 12:22pm

सच्ची तो कोई बात बने ..बढ़िया

Comment by Neeraj Neer on August 4, 2015 at 4:22pm

वाह बहुत खूब ...

Comment by S.S Dipu on August 4, 2015 at 2:22pm
Respected Sushil sarna ji. Yakeen maniye mera kaleja Dugana ho gaya apki prashansa se. It means a lot to me. Meine Ye bohut bachapan mein likhi thi aaj iska fal mila hai.
Thanks a lot sir

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