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मील के पत्थर ....

मील के पत्थर....

पत्थर पर तो हर मौसम
बेअसर हुआ करता है
दर्द होता है उसको
जिसका सफ़र हुआ करता है
सिर्फ दूरियां ही बताता है
निर्मोही मील का पत्थर
इस बेमुरव्वत पे कहाँ
अश्कों का असर हुआ करता है
हर मोड़ पे मुहब्बत को
मंजिल करीब लगती है
हर मील के पत्थर पे
इक फरेब हुआ करता है
कहकहे लगता है
दिल-ऐ-नादाँ की नादानी पर
हर अधूरे अरमान की
ये तकदीर हुआ करता है
कितनी सिसकियों से
ये रूबरू होता है मगर
पत्थर तो पत्थर है
ये अपनी तासीर से
मजबूर हुआ करता है

सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 701

Comment

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Comment by Sushil Sarna on August 12, 2015 at 9:36pm

आदरणीय JAWAHAR LAL SINGH  जी आपकी आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 12, 2015 at 8:31pm

पत्थर तो पत्थर है 
ये अपनी तासीर से 
मजबूर हुआ करता है

मगर आपने भी सुना होगा-

कोई पत्थर की मूरत है

किसी पत्थर में मूरत है

पत्थर भी जल की धारा से चोट खाते खाते रेट में तब्दील हो जाता है और मील का पत्थर मंजिल की दूरी तो बताते हैं.

सादर!... नजरिया है अपना देखने का और कहने का, आदरणीय सरना जी!

Comment by Sushil Sarna on August 12, 2015 at 3:59pm

आदरणीय  laxman dhami  जी आपकी आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on August 12, 2015 at 3:58pm

आदरणीय  गिरिराज भंडारी   जी आपकी आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on August 12, 2015 at 3:58pm

आदरणीय  pratibha pande   जी आपकी आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on August 12, 2015 at 3:58pm

आदरणीय Harash Mahajan  जी आपकी आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on August 12, 2015 at 3:57pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर   जी आपकी आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 12, 2015 at 11:19am

आ० भाई सुशील जी , भावपूर्ण रचना हुई है हार्दिक बधाई .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 11, 2015 at 2:46pm

पत्थर अंततः पत्थर ही होता है , लाजवाब बात कही आदरणीय सुशील भाई ! हार्दिक बधाई आपको ।

Comment by pratibha pande on August 11, 2015 at 9:57am
हर मील के पत्थर पे एक फरेब हुआ करता है , बहुत सुन्दर रचना है , बधाई आ० सुशील सरना जी

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