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समर्पण
“वाह री मर कर भी तर गईं तिवारिन तो” मिथिला काकी ने मंदिर की सीढ़ियों पर बैठी अपनी सखियों के समूह में सुरसुरी छोड़ी..
“वो कैसे बहन जी ?” उन्ही की समवयस्क जानकी ताई ने उत्सुकुता से पूछा.
“अरे कितनी सेवा की थी बहुरिया उनकी और अब उनके सिधारने के बाद अपनी नौकरी छोड़ ससुर की सेवा में लग गई.” मिथिला काकी ने खुलासा किया.
मुहल्ले भर की बुढियों को ईर्ष्या हो उठी स्वर्ग-सिधारी तिवारिन से, कितनी समर्पित बहू मिली है.
घर आते हुए महिला मंडल की बात चीत-सुन रधिया से रहा ना गया. सीधे तिवारी जी की बहू के पास पहुंची और बोली “क्या भाभी कौन सा टोना किए हो पूरे मुहल्ले की औरतों पर?सब तुम्हारे ही गीत गा रहीं हैं सुना है नौकरी भी छोड़ दिए हो? इनकी सेवा करे खातिर ”
“क्या धरा था स्कूल की मास्टरी में दिन भर खटो और महीने के पांच हज़ार.. बाबू जी को सोलह हज़ार तो पेंशन मिलती है और जब तक जीवित हैं बिजली भी मुफ्त...”
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by harikishan ojha on September 11, 2015 at 12:31pm

बहुत सुन्दर

Comment by Seema Singh on August 29, 2015 at 5:21pm

आभार कांता जी आपकी टिप्पणी बहुत उद्बोधित करती है..

Comment by kanta roy on August 28, 2015 at 10:35pm

बहुत खूब लिखा है आपने आदरणीया सीमा जी ,.....इस सार्थक लघुकथा के लिये बधाई स्वीकार करे । 

Comment by Seema Singh on August 28, 2015 at 9:20am
आभार आ० मिथिलेश जी, आ० महर्षी जी एवं आ० हर्ष जी आप सभी को ह्रदय से धन्यवाद।
Comment by Seema Singh on August 28, 2015 at 9:16am
बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय रवि जी। आपकी टिप्पणी मनोबल बहुत बढ़ा देती है। आभार ।
Comment by Ravi Prabhakar on August 28, 2015 at 8:44am

आदरणीय सीमा जी, बहुत सधा व तरारा तंज कसा है आपने अपनी लघुकथा के माध्‍यम से । आजकल तो सेवा भावना भी अर्थप्रधान बन कर रह गई है। इस कसी हुई लघुकथा के लिए आपको बहुत बहुत शुभकामनाएं । कथा शीर्षक से लेकर अंतिम पंक्‍ित तक कसी हुई बनी है और इसकी पंच लाइन तकरीबन तकरीबन नाकआउट पंच में सफलतापूर्वक परिवर्तित हुई है। सादर शुभकामनाएं


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 28, 2015 at 1:43am

आदरणीया सीमा जी बहुत ही बेहतरीन लघुकथा हुई है. शीर्षक को सार्थक करती इस प्रस्तुति पर आपको हार्दिक बधाई. सादर 

Comment by maharshi tripathi on August 27, 2015 at 8:39pm

काश ऐसी समर्पित भावना आजकल की सभी बहुओं के हृदय में हो तो परिवार ,में सुख शन्ति बनी रहेगी ,,इस सुन्दर संदेसात्मक कथा पर आपको बधाई आ. Seema singh जी |

Comment by Harash Mahajan on August 27, 2015 at 2:08pm

आदरणीय Seema singh जी समाज की छुपी हुई ईर्ष्या सहज भाव से इस लेख के द्वारा बहुत ही उम्दा तरीके से उजागर कर गए आप...यही आम जीवन की कहानी है.....बहुत ही सुंदर पेशकश | बधाई | सादर !!

Comment by Seema Singh on August 27, 2015 at 12:32pm
आभार आदरणीया अर्चना जी एवं आभार आदरणीय तेज वीर जी

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