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ग़ज़ल:गगन में हैं हमारे पाँव भूतल ढूँढ़ते हैं (भुवन निस्तेज)

है खोया क्या  किसे वो आज हर पल ढूँढ़ते हैं,

गगन में हैं हमारे पाँव भूतल ढूँढ़ते हैं ।

 

सभाओं में कोई चर्चा कोई मुद्दा नहीं है,

सभी नेपथ्य में बैठे हुए हल ढूँढते हैं ।

 

उन्हें होगा तज्रिबा भी कहाँ आगे सफर का,

वो सहरा में नदी, तालाब, दलदल ढूँढ़ते हैं ।

 

कहीं से खुल तो जाये कोठरी ये आओ देखें,

दरों पर खिडकियों पर कोई सांकल ढूँढ़ते हैं ।

 

यूँ भी बेकारियों का मसअला हो जायेगा हल,

जो अब तक खो दिया है चल उसे कल ढूँढ़ते हैं ।

 

यहाँ पर भी किसी दिन कोई लंगर सा लगा था,

ये बच्चे आज भी शायद वो पत्तल ढूँढ़ते हैं ।

 

सड़क पर जम गई यादों की पपड़ी देखिये तो,

इधर गुजरा हो शायद ख्वाब घायल ढूँढ़ते हैं ।

 

हैं निकले घोंसलों को छोड़ पहली बार बाहर,

परिंदे खो गए शायद उन्हें चल ढूँढ़ते हैं ।

 

जो कल तक पेड़ में लगने न देते कोई पत्ता,

बड़ी ही बेहयाई से वही फल ढूँढ़ते हैं ।

मौलिक व अप्रकाशित...

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Comment by Jayprakash Mishra on October 7, 2015 at 9:19pm
Achchhe khayalaat ki gazal ke liye Badhaai Adarniy Bhauvan ji
Comment by जयनित कुमार मेहता on October 2, 2015 at 7:06am
वाह!शानदार ग़ज़ल है..आदरणीय भुवन जी..
Comment by भुवन निस्तेज on September 7, 2015 at 2:48pm

आदरणीय gumnaam pithoragarhi,आदरणीय rajesh kumari और गिरिराज भंडारी अत्यधिक dhanyvaad


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2015 at 10:25am

आदरणीय भुवन भाई , बहुत खूब सूरत गज़ल हुई है ! आदरणीय सौरभ भाई के सुझाये सुधारों के बाद और भी शान्दार हो जायेगी । आपको इस बेहतरीन गज़ल के लिये हिली बधाइयाँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 2, 2015 at 10:05am

यहाँ पर भी किसी दिन कोई लंगर सा लगा था,

ये बच्चे आज भी शायद वो पत्तल ढूँढ़ते हैं ।----वाह्ह्ह्ह  आ० भुवन जी क्या जबरदस्त शेर कहा है 

जो कल तक पेड़ में लगने न देते कोई पत्ता,

बड़ी ही बेहयाई से वही फल ढूँढ़ते हैं ।---कमाल 

आ० सौरभ जी की इस्स्लाह के बाद ग़ज़ल निखर उठी | आपको दिल से बहुत- बहुत बधाई . 

Comment by gumnaam pithoragarhi on September 1, 2015 at 7:33pm

वाह भुवन  भाई जी बहुत खूब ... सौरभ जी ने विस्तार से चर्चा कर दी है ............. इस खूब सूरत ग़ज़ल के लिए बधाई

Comment by भुवन निस्तेज on September 1, 2015 at 9:26am

आदरणीय Saurabh Pandey साहब मुझे आपसे सदैव इसी प्रकार के स्नेह की अपेक्षा रहती है . मैं इस गजल पर आपके इस्सलाह के अनुरुप संशोधन कर रहा हूँ .

Comment by भुवन निस्तेज on September 1, 2015 at 9:23am

आदरणीय मिथिलेश वामनकर साहब धन्यवाद...

Comment by भुवन निस्तेज on September 1, 2015 at 9:23am

आदरणीय Abhinav Arun  जी धन्यवाद...

Comment by भुवन निस्तेज on September 1, 2015 at 9:21am

आदरणीय Harash Mahajan जी आपने मेरे प्रयास को सराहा बहुत बहुत धन्यवाद...

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