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आज लगता है शायद बदल गया है आदमी ,
अपनी लगाई आग में ही जल गया है आदमी,

कल जिस चीज  की ओर नजर  भी नही फेरता था,
आज  उसी के लिए  ही क्यूँ मचल गया है आदमी  ,

कल तक था जो पत्थरों  की तरह  अडिग ,
आज बर्फ की तरेह क्यूँ गल गया है आदमी ,

कल तक तो जिसकी कोई सीमा ही तय नही थी,
आज तो साचें में ही ढल गया है आदमी,

डरता था जो कभी धोखे की बात करने से भी,
आज तो विश्वास को ही मसल  गया है आदमी,

कल डरता था आसमा की और देखने से जो ,
आसमा को आज पैरों तले कुचल गया है आदमी ,

कल तक खून के दबे से डरता था जो ,
आज करके एक कतल गया है आदमी ,

बताता था कल आदमी की पहचान जो ,
आदमियत को आज वह बदल गया है आदमी ,

अपनी लगाई आग में ही जल गया है आदमी ,
आदमी के मायने बदल गया है आदमी //////////////

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Comment

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Comment by आशीष यादव on April 14, 2011 at 2:31pm
bagi ji ne bilkul thik kaha aapki ghazal ke baare me. mere taraf se badhai swikaar kariye.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 14, 2011 at 9:41am
राजिव जी , बेहतरीन ख्यालात से सजी सुंदर ग़ज़ल कही है आपने , आदमी के कई सारे रूप आपकी ग़ज़ल में मौजूद दिखा | दाद कुबूल कीजिये |

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