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हिन्दी गज़ल - ज्ञान की अति खा रही है भावनायें ( गिरिरज भंडारी )

2122     2122     2122

एक दिन आ कर तुम्हें भी हम हँसायें

यदि हमारे बहते आँसू मान जायें

 

क्यों समय केवल उदासी बांटता है ?

क्या समय के पास बस हैं वेदनायें

 

जानकारी ठीक है ,पर ये भी सच है

ज्ञान की अति खा रही है भावनायें

 

इस तरफ है पेट की ऐंठन सदी से

उस तरफ़ है भूख पर होतीं सभायें  

 

बात में बारूद शामिल है उधर की

हम कबूतर शांति के कैसे उड़ायें ?

 

अब धरा को छू रहा है सर हमारा

और कितना, बोलिये हम सर झुकायें ?

 

लूट, मक्कारी छपी है पृष्ठों में सब

अब जगह पातीं नहीं जातक कथायें

 

मित्रता की बातें वो भी कर रहे हैं

वो जिन्हें अवसर मिले तो काट खायें

 

अब कहाँ सम्भावना ढूँढे बताओ ?

ईद दीवाली सभी मिल जुल मनायें

 

आसमानों की अगर इच्छा बची है

पंख तौलें, और थोड़ा फड़फड़ायें

 

जब अँधेरा ही अँधेरा है इधर तो

क्यों न दीपक राग ही हम गुनगुनायें

**********************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 15, 2015 at 7:47pm
आदरणीय गिरिराज सर बेहतरीन ग़ज़ल हुई है बहुत बहुत बधाई आपको

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 15, 2015 at 7:30pm

आदरनीय आमोद भाई , हौसला अफज़ाई का दिली शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 15, 2015 at 7:30pm

आदरणीय श्याम नारायन भाई , आपका दिली शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 15, 2015 at 7:29pm

आदरणीय सुशील भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका हृदय तल से आभारी हूँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 15, 2015 at 7:28pm

आदरणीय रवि भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 15, 2015 at 7:27pm

आदरणीय समर कबीर भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ।

हम कबूतर शांति के कैसे उड़ायें ?   --- आपने इस मिसरे को फिर से ध्यान देने के लिये कहा है , पर आदरणीय मै अपनी गलती खुद नही समझ पा रहा हूँ , कृपया बताने की कृपा करें ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 15, 2015 at 7:24pm

आदरणीय विजय भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका हृदय से आभारी हूँ ।

Comment by amod shrivastav (bindouri) on September 15, 2015 at 5:59pm
बधाई
सम सामयिक परिस्थित पर
सार्थक रचना

सादर नमन
Comment by Shyam Narain Verma on September 15, 2015 at 5:11pm

इस प्रस्तुति हेतु बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ.

 सादर

Comment by Sushil Sarna on September 15, 2015 at 3:48pm

इस तरफ है पेट की ऐंठन सदी से
उस तरफ़ है भूख पर होतीं सभायें
वाह आदरणीय गिरिराज भाई साहिब बहुत ही खूबसूरत अहसासों के अशआर आपने ग़ज़ल में पिरोये हैं। हार्दिक बधाई कबूल फरमाएं सर।

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