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ग़ज़ल : हुई जो खबर नाम चलने लगा है

हुई जो ख़बर नाम चलने लगा है ।

ये सारा जहां  हमसे जलने लगा है ।।

 

यहां झूठ से सबको नफरत है फिर भी ।

है किसकी ये शह जो मचलने लगा है ।।

न तुम आग उगलो न मै ज़ह्र घोलूं  ।

ये सोचें लहू क्‍यूँ उबलने लगा है ।।

बुरे वक्त में लोग करते है जुर्रत ।

हुई शाम सूरज भी ढलने लगा है ।।

तुम्‍हें देखते ही  हमारी कबा से ।

उदासी का आलम पिघलने लगा है ।।

 

अज़ल से वही है ज़फ़ा का बहाना ।

 कि मौसम के जैसा बदलने लगा है ।।

 

ये सूखे शज़र छांव देने लगे फिर ।

कि घर का भी मंज़र बदलने लगा है ।।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 20, 2015 at 10:18pm

बहुत ख़ूब आदरणीय रवि साहब, ख़ूबसूरत अश’आर के लिए दाद कुबूल करें

Comment by Ravi Shukla on September 18, 2015 at 3:04pm

आदरणीय मनोज जी हमारे अहसास तक आपकी रसाई हुई ये सुकून का बायस है । बहुत बहुत शुक्रिया जनाब ।

Comment by मनोज अहसास on September 17, 2015 at 8:54pm
नमस्कार सर
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई है
इस शेर ने एक हवा का झोके का अहसास दिया है

तुम्‍हें देखते ही हमारी कबा से ।
उदासी का आलम पिघलने लगा है ।।

सादर बधाई इनायत की इल्तज़ा के साथ
Comment by Ravi Shukla on September 17, 2015 at 1:43pm
आदरणीय डा .गोपाल नारायण जी ग़ज़ल पर आपकी गरिमामयी उपस्थिति से अपने लेखन के प्रति उत्तरदायित्व का भाव और बढ़ गया है । सादर प्रणाम ।
Comment by Ravi Shukla on September 17, 2015 at 1:29pm
आदरणीय श्री सुनील जी ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति का बहुत बहुत आभार ।
Comment by Ravi Shukla on September 17, 2015 at 1:27pm
आदरणीय समर कबीर साहब । आदाब ,आपको ग़ज़ल पसंद आई ये हमारे लिए बहूत ही ख़ुशी का बायस है ,गोया योमे पैदाइश का पेशगी तोहफा मिल गया है । आपकी इस हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया । अनुग्रह बनाये रखियेगा। सादर ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 17, 2015 at 1:21pm

बहुत बढ़िया आली जनाब .

Comment by Ravi Shukla on September 17, 2015 at 1:03pm
आदरणीय मिथिलेशजी । आपको ग़ज़ल पसंद आई धन्यवाद् आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया उत्साह बढाती है ।
Comment by Ravi Shukla on September 17, 2015 at 1:02pm
आदरणीय दिनेश जी आपकी ग़ज़ल पर उपस्थिति और दाद पाकर बहुत ख़ुशी हुई । आभार ।
Comment by दिनेश कुमार on September 17, 2015 at 5:14am
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है आदरणीय रवि साहब। बहुत बहुत बधाई व दाद आप को।

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