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ग़ज़ल : जब कभी तनहाइयों का

2122      2122     2122    212

जब कभी तनहाइयों का आईना मुझको मिला ।

अपने अन्दर आदमी इक दूसरा मुझको मिला ।।

 

हमसुखन वो हमनफ़स वो हमसफ़र हमजाद भी ।

जान लूँ इस चाह में कब आशना मुझको मिला ।।

 

वक्ते रुखसत हाल उसका भी यही था दोस्तों ।

अक्स मेरा चश्मे नम पर कांपता मुझको मिला ।।

 

मंज़िलों से  और बेहतर हसरते मंज़िल लगे ।

लिख सकूं तफसील जिसकी रास्ता मुझको मिला ।।

 

जो बजाते खुद हुआ इल्मो अदब का आफ़ताब ।

रौज़नो से कैद की वो झांकता मुझको मिला ।।

 

मौलिक एवं अप्राशित

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on November 3, 2015 at 6:38pm

अति सुन्दर . बढ़िया ग़ज़ल .मुबारकबाद !!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on September 24, 2015 at 3:13pm
हमसुखन वो हमनफ़स वो हमसफ़र हमजाद भी ।
जान लूँ इस चाह में कब आशना मुझको मिला ?

बहुत खूब!आ.रवि जी बधाई।
Comment by Shyam Narain Verma on September 23, 2015 at 4:29pm
बहुत सुन्दर गजल।  ढेरों दाद कुबूल करें। सादर
Comment by Samar kabeer on September 22, 2015 at 11:44pm
जनाब रवि शुक्ल जी,आदाब,बहुत ही मुरस्सा ग़ज़ल कही है आपने,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।


"जो बजाते खुद हुआ इल्मो अदब का आफ़ताब
रौज़नो से कैद की वो झांकता मुझको मिला"

इस शैर में कुछ कहना चाहूँगा:-

ऊला मिसरे में 'हुवा' शब्द ठीक नहीं लग रहा है,इस शैर के भाव मेरे नज़दीक ये हैं कि ,जो बज़ात-ए-ख़ुद इल्म-ओ-अदब का आफ़ताब है,वो क़ैद ख़ाने के रौशन दानों से झाँक रहा है,देख लीजियेगा ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 22, 2015 at 5:46pm

आदरणीय रवि जी, यकीनन यह भूलवश हुआ है. बाकी निर्णय आदरणीय प्रधान संपादक महोदय ही लेंगे. आपकी सदाशयता के लिए आभार.

Comment by Ravi Shukla on September 22, 2015 at 5:43pm

आदरणीय मिथिलेश जी

सर्व प्रथम जो भूल हमसे हई उसके लिये खेद है स्‍मरण नही रहा कि आरंभिक दौर में कही गई गज़ल पहले हम आरकुट पर दे चुके है पुरानी गजलों को जिन्‍हे कभी गज़ल कह  लेते थे उन्‍हें अब सीखे हुए ज्ञान से सुधार कर देखने ( ताकबुले रदीफ दोष के कारण बदनना ) और आप लोगो से साझा करने के उत्‍साह मे ही ये त्रुटि हुई है । पुन: इसके लिये खेद व्‍यक्‍त करते हुए निवेदन है कि इसे तुरंत प्रभाव से हटा दिया जाए । इससे अधिक इस पर हम और कुछ कहने की स्थिति में नहीं है । सादर ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 22, 2015 at 5:39pm

आदरणीय रवि जी, बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. बधाई. लेकिन ये पुरानी ग़ज़ल है जिसमें आपने केवल एक मिसरे-"मंज़िलों से और बेहतर हासिले मंज़िल लगा ' को बदल कर "मंज़िलों से और बेहतर हसरते मंज़िल लगे " किया है. ये ग़ज़ल ऑरकुट के 'Hindi Sahitya Sabha' फोरम में 2010 में ही आप प्रकाशित कर चुके है. अतः यह ग़ज़ल अप्रकाशित नहीं है.


http://orkut.google.com/c119731-tb9f61279f5608a63.html

नियम २(च) के अनुसार लेखक केवल वही रचना प्रकाशन हेतु पोस्ट करें जो कि पूर्णतया अप्रकाशित हो | किसी भी ऐसी रचना को स्थान नहीं दिया जायेगा जो किसी वेबसाईट, ब्लॉग अथवा किसी सोशल नेटवर्किंग साईट पर पूर्व मे प्रकाशित हो चुकी हो | रचनाकार यदि कोई रचना अपनी पूर्व प्रकाशित पुस्तक में से पोस्ट करे तो कृपया उसका ब्यौरा अवश्य दें | ओ बी ओ आयोजनों में प्रस्तुत रचना भी प्रकाशित मानी जाएगी और पुनः उसका प्रकाशन ओ बी ओ पर नहीं किया जायेगा (स.०१.०४.१२)

यह नियम स्पष्ट रूप से कहता है कि, ओ बी ओ पर वही रचना पोस्ट करे जो वेब पर किसी माध्यम से पोस्ट (प्रकाशित) न हो । यानि, आपके निजी ब्लॉग्स, फेसबुक, ऑर्कुट सहित किसी सोशल नेटवर्किंग साइट अथवा वेबसाइट सभी इसकी ज़द में आते हैं । केवल प्रिंट माध्यम में प्रकाशित रचनाएँ, जोकि वेब माध्यम में प्रकाशित न हो, को वेब हेतु अप्रकाशित मानते हुए ओ बी ओ पर प्रकाशित करने की अनुमति प्रदान करते हैं ।

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सादर 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 22, 2015 at 4:20pm
बेहद ख़ूबरू ग़ज़ल के लिए अभिवादन्।

कृपया ध्यान दे...

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