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फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन


तू भले कुछ भी कहे मैं कामना करता रहूँगा
रूप रस की चाहना- आराधना करता रहूँगा।
जल रहा संसार खुद से आग अपनी ही जलाये
बाँट आया प्यार घर- घर याचना करता रहूँगा।
जो लगाते आग चलते ज्वाल उनको हो मुबारक
मैं चला हूँ मेघ बनकर साधना करता रहूँगा।
दे रही जो दर्द चपला कर सकूँ बे-दर्द उसको
हो धरा मैं सोंख लूँ यह कामना करता रहूँगा।
आदमी हो आदमी का हो गया सब भूलकर भी
आदमी के हित रहूँ मैं प्रार्थना करता रहूँगा।

.
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Views: 466

Comment

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Comment by Manan Kumar singh on September 27, 2015 at 7:31pm

आदरणीय मिश्रा जी, प्रेरणा देने हेतु आभार आपका। 

Comment by Manan Kumar singh on September 27, 2015 at 7:30pm

आदरणीय वामनकर जी,गजल की सराहना कर प्रेरणा देने के लिए आभार आपका। 

Comment by Manan Kumar singh on September 27, 2015 at 7:28pm

आदरणीय गोपाल भाई, आभार आपका। 

Comment by Manan Kumar singh on September 27, 2015 at 7:28pm

अदरणीय रवि जी, आभार आपका, सादर। 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on September 24, 2015 at 3:22pm
जो लगाते आग चलते ज्वाल उनको हो मुबारक
मैं चला हूँ मेघ बनकर साधना करता रहूँगा।

बहुत खूब आ.मनन जी बेहद सुन्दर गजल हुयी है..हार्दिक बधाई।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 24, 2015 at 12:15pm

आदरणीय मनन जी बह्र-ए-रमल को खूब निभाया है. बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है. आपको हार्दिक बधाई 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 23, 2015 at 8:48pm

बहुत बढ़िया.  प्रवाह तो देखते ही बनता है .

Comment by Ravi Shukla on September 23, 2015 at 1:21pm

आदरणीय मनन जी

ग़ज़ल में शिल्‍प के अनुकूल सुन्‍दर प्रवाह बन पड़ा है बधाई

कृपया ध्यान दे...

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