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ग़ज़ल : मैं पागल था मगर इतना नहीं था

बह्र : १२२२ १२२२ १२२

 

सनम जब तक तुम्हें देखा नहीं था

मैं पागल था मगर इतना नहीं था

 

बियर, रम, वोदका, व्हिस्की थे कड़वे

तुम्हारे हुस्न का सोडा नहीं था

 

हुआ दिल यूँ तुम्हारा क्या बताऊँ

मुआँ जैसे कभी मेरा नहीं था

 

यकीनन तुम हो मंजिल जिंदगी की

ये दिल यूँ आज तक दौड़ा नहीं था

 

तुम्हारे हुस्न की जादूगरी थी

कोई मीलों तलक बूढ़ा नहीं था

-------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 828

Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 19, 2015 at 12:36am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय राहुल जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 19, 2015 at 12:36am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय रवि शुक्ला जी

Comment by Rahul Dangi Panchal on September 28, 2015 at 11:25pm
तुम्हारे हुस्न की जादूगरी थी
कोई मीलों तलक बूढ़ा नहीं था

बहुत सुन्दर आदरणीय
Comment by Ravi Shukla on September 28, 2015 at 2:14pm

आदरणीय धर्मेन्‍द्र जी  बहुत बढि़या  शानदार अंदाजे बयां के लिये बधाई ।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 28, 2015 at 11:30am

तह-ए-दिल से शुक्रिया आदरणीय गिरिराज जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 28, 2015 at 11:30am

शुक्रिया आदरणीय गोपाल नारायन जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 28, 2015 at 11:29am

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आदरणीय मिथिलेश जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 28, 2015 at 11:25am

शुक्रिया आदरणीय जयनित जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 28, 2015 at 11:25am

शुक्रिया आदरणीय अजय जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 28, 2015 at 11:25am

शुक्रिया आदरणीय पंकज कुमार जी

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