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तुम न समझ पाओगे .....

तुम न समझ पाओगे .....

तुम न समझ पाओगे
मुहब्बत की ज़मीन पर
कतरा कतरा बिखरते
रूमानी अहसासों के सायों का दर्द
तुम तो बुत हो
सिर्फ बुत
जिसपर कोई रुत असर नहीं करती
तुम से टकराकर
हर अहसास संग -रेज़ों में तक़सीम जाता है
और साथ चलते साये का वज़ूद
सिफर में तब्दील हो जाता है
रह जाते हैं बस शानों पर
स्याह शब में गुजरे चंद लम्हे
जो आज मुझे किसी माहताब में
लगे दाग़ की तरह लगते हैं
तुम्हारी याद का हर अब्र
मेरी चश्म को
सावन का कहर दे जाता है
मेरे ख़्वाबों को
दर्द का आफ़ताब दे जाता है
मेरे रुखसार पर बहता काजल
अहसास के आगाज़ को अंजाम दे जाता है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 561

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Comment by Sushil Sarna on October 8, 2015 at 6:03pm

आदरणीय  narendrasinh chauhan जी प्रस्तुति पर आपकी आत्मीय प्रशंसा  का दिल से शुक्रिया। 

Comment by Sushil Sarna on October 8, 2015 at 6:03pm

आदरणीय   Dr. Vijai Shanker    जी प्रस्तुति पर आपकी आत्मीय प्रशंसात्मक अभिव्यक्ति का दिल से शुक्रिया। 

Comment by Sushil Sarna on October 8, 2015 at 6:02pm
आदरणीय Samar kabeer जी प्रस्तुति पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का दिल से शुक्रिया।
Comment by narendrasinh chauhan on October 8, 2015 at 5:27pm

खूब सुन्दर रचना

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 7, 2015 at 11:55pm
तुम न समझ पाओगे
मुहब्बत की ज़मीन पर
कतरा कतरा बिखरते
रूमानी अहसासों के सायों का दर्द
तुम तो बुत हो
सिर्फ बुत
जिसपर कोई रुत असर नहीं करती
तुम से टकराकर।
बहुत खूब, आदरणीय सुशील सरना जी , बधाई , सादर।
Comment by Samar kabeer on October 7, 2015 at 11:12pm
जनाब सुशील सरना जी,आदाब,वाह,बहुत ख़ूब,आपकी कविताऐं मुझे बहुत पसंद आती हैं,ये कविता भी उन्हीं कविताओं में से है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं।
Comment by Sushil Sarna on October 7, 2015 at 5:18pm

आदरणीय हर्ष महाजन  जी प्रस्तुति पर आपकी आत्मीय प्रशंसा  का दिल से शुक्रिया। 

Comment by Sushil Sarna on October 7, 2015 at 5:17pm

आदरणीया कांता रॉय     जी प्रस्तुति पर आपकी आत्मीय प्रशंसात्मक अभिव्यक्ति का दिल से शुक्रिया। 

Comment by Harash Mahajan on October 7, 2015 at 1:36pm

आ० Sushil Sarna जी एक अच्छी और दिल को छूने वाली रचना !! बधाई !!

Comment by kanta roy on October 7, 2015 at 12:57pm

तुम न समझ पाओगे
मुहब्बत की ज़मीन पर
कतरा कतरा बिखरते
रूमानी अहसासों के सायों का दर्द
तुम तो बुत हो
सिर्फ बुत ...........बहुत खूब कही है आपने इन् बुतों की दास्तान। दिल को छूकर निकली है ये पंक्तियाँ।

तुम्हारी याद का हर अब्र
मेरी चश्म को
सावन का कहर दे जाता है
मेरे ख़्वाबों को
दर्द का आफ़ताब दे जाता है..... भाव में डूबी हुई ये अल्फ़ाज़ बेहतरीन  है। बधाई आपको इस सार्थक रचना के लिए आदरणीय सुशील सरना जी

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