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तरही ग़ज़ल_मनोज अहसास

1222 1222 1222 1222


मेरी आँखों से ऎसे दर्द का रिश्ता निकल आया
जिसे रक्खा निग़ाहों में वही कतरा निकल आया

वो जिसको सारी दुनिया की खुदा ने बख्श दी दौलत
उसी के घर मेरा खोया हुआ कांसा निकल आया

न मेरे हिस्से में तेरी झलक थी इक नज़र को भी
बहुत परदे हटाये फिर भी एक पर्दा निकल आया

मैं दसरथ मांझी का किस्सा भी इस मिसरे में कहता हूँ
किसी की जिद के आगे नूर का रस्ता निकल आया

जो उसने कह दिया गर वाह बिना समझे ग़ज़ल मेरी
मेरे सिर भी कई अल्फ़ाज़ का खर्चा निकल आया

है कुछ तो काफ़िया बढ़िया ज़रा मुझमे भी सुस्ती है
बड़ी मुश्किल है के याद का सदमा निकल आया

ज़रा सी देर मे सारा फ़साना लिख गए कातिल
बनाई बरसो की बुनियाद पे झगड़ा निकल आया

मै तेरे इश्क़ की बातों को कैसे हू-ब-हू लिख दूँ
कहीं कतरा निकल आया कहीं दरिया निकल आया

बड़ी मुश्किल में हूँ दिलबर अलग अंदाज़ से तेरे
यूँ कैसे झील सी आँखों में ये सहरा निकल आया

ग़ज़ल में मुझको अपनी बात कहने का सलीका दे
ज़रा से इल्म से "अहसास" पर खतरा निकल आया


मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by मनोज अहसास on October 15, 2015 at 2:17pm
आप सभी को सादर प्रणाम
ग़ज़ल में शिरकत के लिए और सुझावों के लिए आभार
सुधारने का प्रयास करता हूँ
सादर
Comment by Ravi Shukla on October 15, 2015 at 12:55pm

आदरणीय मनोज जी अच्छी गज़ल कही है , हार्दिक बधाई स्‍वीकार करें ।

न मेरे हिस्से में तेरी झलक थी इक नज़र को भी
बहुत परदे हटाये फिर भी एक पर्दा निकल आया  इस में एक को इक करने से प्रवाह सही हो सकता है

जो उसने कह दिया गर वाह बिना समझे ग़ज़ल मेरी
मेरे सिर भी कई अल्फ़ाज़ का खर्चा निकल आया  पहले मिसरे को किस तरह पढते है इस पर   वाह और बिना  निर्भर करेगा  नहीं तो वाह के ह को पूरा समय दें तो बिन करने से रुक्‍न सही हो सकता है

ज़रा सी देर मे सारा फ़साना लिख गए कातिल
बनाई बरसो की बुनियाद पे झगड़ा निकल आया  बहुत खूब  कई किस्‍से इससे निकलते है अच्‍छा चित्रण है बधाई ।

बड़ी मुश्किल में हूँ दिलबर अलग अंदाज़ से तेरे
यूँ कैसे झील सी आँखों में ये सहरा निकल आया   .....  वाह वाह क्‍या बात है मनोज जी क्‍या विरोधाभास लेकर आये है

ग़ज़ल में मुझको अपनी बात कहने का सलीका दे
ज़रा से इल्म से "अहसास" पर खतरा निकल आया .....अजी कहते रहिये शेर किसी तरह का खतरा नहीं है । दिली दाद कुबूल करिये ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 14, 2015 at 9:25pm

आदरणीय मनोज भाई , अच्छी गज़ल कही है , हार्दिक बधाइयाँ ॥

जो उसने कह/ दिया गर वा/ ह बिना समझे / ग़ज़ल मेरी  ---  मिसरा तीसरे रुक्न से बेबहर है

और -
है कुछ तो काफ़िया बढ़िया ज़रा मुझमे भी सुस्ती है
बड़ी मुश्किल है के याद का सदमा निकल आया      --- इस शेर मे आप क्या हनना चाहतें है , मै नही समझ सका , हो सकता है मेरी समझ ही कम हो , फिर भी एक बार सोच लीजियेगा ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 14, 2015 at 4:02pm

बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है आदरणीय मनोज भाई 

शेर दर शेर दाद हाज़िर है 

Comment by मनोज अहसास on October 13, 2015 at 10:00pm
बहुत आभार आदरणीय मेहता जी
सादर
Comment by जयनित कुमार मेहता on October 13, 2015 at 8:38pm
वाह, सुन्दर अश'आर हुए हैं..

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